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यादों का झूला…

फिर आया वो यादों का झूला,
शबनमी शाम का पहरा था,
और तू मेरे पास था,
कोई गम न तेरे- मेरे आस- पास था,
दरमियां में खुशियों का साया था,
होठों पर सुर का आगाज था,
जाने कहां गयी वो मखमली शाम,
काश ! यह गम की खलिश न होती,
और तू मेरे पास होता…….,
गर निभाना ही न था,
तो जताया ही क्यों था,
खुद की तपिश में डुबोया ही क्यों था,
तूने प्यार को व्यापार समझा क्यों था,
चला गया तू और की पनाहों में,
गिर गया तू मेरी निगाहों से,
क्या कहूं किसे कहूं……
किसी पत्थर दिल से दिल लगाया था,
किसी पत्थर दिल से दिल लगाया था……।।

©पूनम सिंह, गुरुग्राम, हरियाणा

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