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वरदान…

रागिनी मां सरस्वती की बड़ी भक्त थी। नित्य मां सरस्वती की पूजा अर्चना करती थी। मां की कृपा से उसने बहुत मीठा गला पाया था। मीठी आवाज़ के साथ साथ वह सुरों में भी पारंगत थी। उसे संगीत में बहुत रुचि थी।उसके माता पिता अधिक संपन्न नहीं थे इसलिए संगीत की विधिवत शिक्षा नहीं हो पाई थी। उसके विद्यालय के संगीत शिक्षक उसे विशेष रूप से संगीत सिखाते तथा गायन प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए भी उसे प्रेरित करते। विद्यालय की शिक्षा पूरी होते होते संगीत के क्षेत्र में रागिनी अपने शहर में प्रसिद्ध हो चुकी थी। सभी लोग उसकी गायन प्रतिभा के कायल थे। वह जिस कार्यक्रम में जाती, उसे सराहना प्राप्त होती। स्नातक पूरा होते होते शहर के बाहर भी वह लोकप्रिय हो चुकी थी। सभी सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उसकी उपस्थिति अनिवार्य हो गई थी।
रागिनी की दो छोटी बहनें भी थी। वे उसकी तरह प्रतिभाशाली तो नहीं थी परन्तु उसके माता पिता उन दोनों को भी सामर्थ्य अनुसार अच्छी परवरिश दे रहे थे। रागिनी अपने माता पिता का बहुत सम्मान करती थी। बहनों में सबसे बड़ी होने के कारण उनकी स्थिति को भी समझती थी। यही कारण था कि पिता के कहने पर एक अच्छे परिवार से आए रिश्ते को वह मना नहीं कर पाई। वह अपने माता पिता का सहारा बनना चाहती थी, उनके ऊपर बोझ नहीं। संगीत के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने का अवसर उसके हाथ से निकल गया। उसका विवाह एक परंपरागत भारतीय परिवार में हुआ था। लड़का अपनी उच्च शिक्षा के लिए विदेश गया था इसलिए उसकी दादी ने उसकी शादी करवा दी थी। उन्हें डर था कहीं किसी विदेशी लड़की को ब्याहकर ना ले आए। रागिनी ससुराल आ गई। किसी चीज की कोई कमी नहीं थी, सभी उससे स्नेह करते थे। सास यदि कुछ कह भी देती तो दादी उसकी सास को ही ग़लत ठहरा देती। सुबह उसके हाथ की बनाई हुई चाय पीकर ही दादी बिस्तर से उठती और रात में उससे बातें करके ही सोती। रागिनी भी सबको खुश रखने की पूरी कोशिश करती। किसी को भी शिकायत का मौका नहीं देती। लेकिन जब फोन पर अपनी मां से बात करती तो उसका दिल भर आता। उसके भीतर का कलाकार खुश नहीं था।
संयोग से घर पर वसंत पंचमी की पूजा रखी गई । रागिनी ने पूजा की आरती के साथ साथ कई भजन भी गाए। सभी उसकी मधुर वाणी की प्रशंशा कर रहे थे। दादी ने भी बहुत ही खुश होकर उसका गायन सुना और मुक्त कंठ से प्रशंशा भी की। पूजा ख़त्म हो गई, सब अपने अपने काम में व्यस्त हो गए। सोने से पहले रागिनी दादी के कमरे में गई तो दादी ने उसे अपने पास बिठाया, बोली ” बहुत सुंदर गाती हो रागिनी। मैं कल तुम्हे पुरस्कार दूंगी।” “आपका आशीर्वाद ही मेरा पुरस्कार है ,दादी मां, उसके अतिरिक्त मुझे कुछ भी नहीं चाहिए।” रागिनी ने खुश होकर कहा। “अच्छी बात है ,लेकिन पुरस्कार देकर मुझे प्रसन्नता मिलेगी”। दादी ने उसकी बात का मुस्कुराकर जवाब दिया। थोड़ी देर बैठकर रागिनी अपने कमरे में सोने चली गई। अगले दिन, दोपहर के समय दादी ने उसे बुलाया। वह उनके पास गई तो देखा कि एक आकर्षक व्यक्तित्व की महिला से दादी कुछ बात कर रही थी। रागिनी से दादी ने उनका परिचय कराया। वो सुर शारदा संगीत विद्यालय की प्रबंधक शैलजा कुमारी थी। रागिनी की खुशी का ठिकाना नहीं था। दादी ने घर के सभी सदस्यों को कमरे में बुलाया और घोषणा की कि उन्होंने रागिनी का दाखिला संगीत विद्यालय में करवा दिया है। कल से ही वह संगीत की विधिवत शिक्षा ग्रहण करेगी। रागिनी को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। वह मां सरस्वती की पूजा करती थी परन्तु उसने कभी नहीं सोचा था कि उनका आशीर्वाद इस तरह प्राप्त हो जाएगा। दादी के पास बैठी शैलजा कुमारी में उसे मां सरस्वती नज़र आ रही थी। उसने मन ही मन मां शारदे को नमन किया।
मौलिक एवं स्वरचित
©अर्चना त्यागी, जोधपुर

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परिचय -शिक्षा- एम. एस. सी. एम. एड., व्याख्याता विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख व रचनाएं प्रकाशित, वूमेन ऑफ ऑनर अवार्ड से सम्मानित ।

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