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मिहिर! अथ कथा सुनाओ : कृति परिक्रमा

पुस्तक समीक्षा

 

किसी सरस्वती पुत्री की सुदीर्घ सारस्वत साधना का आकलन करना आसान काम नहीं है; विशेषतः उस सरस्वती पुत्री की साधना का आकलन तो और भी कठिन कार्य है, जिसका व्यक्तित्व और कृतित्व बहुआयामी हो, जिसके चिंतन का आकाश विस्तृत एवं व्यापक हो और जो एक साथ कई भाषाओं और विधाओं में निष्णात हो; ऐसी वाणी साधिका का बहिरंग जितना व्यापक होता है अंतरंग उससे कहीं अधिक गहरा। सुप्रसिद्ध कवयित्री डॉ० ममता बनर्जी ‘मंजरी’ ऐसी ही वाणी साधिका और सरस्वती की वरद्‌ पुत्री हैं।

कविता करना कठिन कार्य है और कविता में स्वभाविकता की अभिव्यक्ति तो और भी कठिन कार्य है। अग्निपुराण में लिखा हुआ है —

नवत्वं दुर्लभम्‌ लोके विद्या तत्र सुदुर्लभा: |

कवित्वं तत्र दुलभं शक्ति: तत्र सुदुर्लभा:।।

अर्थात्‌ इस संसार में मनुष्य योनि में जन्म लेना कठिन है (बड़े भाग्य मानुष तन पावा सुर दुर्लभ सद्‌ ग्रंथन गावा – तुलसी) विद्या की प्राप्ति उससे कठिन है, कविता करना उससे कठिनतर और कविता में स्वाभाविक अभिव्यक्ति की उपस्थिति एवं शक्ति तो कठिनतम है। यही कारण है कि हिन्दी के मूर्धन्य समालोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने कविता को मनुष्यता की उच्च भूमि स्वीकार किया है। कविता को परिभाषित करते हुए आचार्य शुक्ल ने चिन्तामणि में लिखा है — “जिसका प्रकाश आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिएए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आयी है उसे कविता कहते हैं। इस साधना को हम भावयोग कहते है

 

और कर्मयोग एवं ज्ञानयोग के समकक्ष मानते हैं। आचार्य शुक्ल की स्थापना है कि कविता ही मनुष्य के हृदय को स्वार्थ संबंधों के संकुचित मंडल से ऊपर उठाकर लोकसामान्य की भावभूमि पर ले जाती है, जहाँ जगत की नाना गतियों के मार्मिक स्वरूप का साक्षात्कार और शुद्ध अनुभूतियों का संचार होता है। इस भूमि पर पहुँचे हुए मनुष्य को कुछ काल के लिए अपना पता नहीं रहता है। वह अपनी सत्ता को लोक सत्ता में लीन किये रहता है। उसकी अनुभूति सबकी अनुभूति होती है या हो सकती है।” कवयित्री डॉ0 ममता बनर्जी का काव्य ‘मिहिर अथ कथा सुनाओ’ इसका ज्वलन्त उदाहरण है।

स्वतंत्र भारत के मानचित्र पर झारखंड का महत्व प्रारंभ से ही रहा है। भूगर्भीय संपदा के कारण यह देश की अर्थव्यवस्था की संरचना में एक ओर अहम्‌ भूमिका निभाता रहा है तो दूसरी ओर सांस्कृतिक एवं साहित्यिक अवदानों के कारण महत्वपूर्ण रहा है। 45 नवम्बर 2000 को झारखंड अस्तित्व में आया। यह प्रकृति की गोद में अवस्थित एक मनोरम प्रदेश है। झारखंड के कलेवर पर गद्य में अनेक रचनायें लिखी गई हैं लेकिन पद्य में इसके कलेवर पर बहुत कम खा गया है। जहाँ तक मेरी अल्प जानकारी है कविवर डॉ० हरेराम त्रिपाठी चेतन’ ने ‘उलगुलान की आग’ शीर्षक से एक 7 सर्गों का प्रबंध काव्य लिखा है जिसका प्रकाशन 2015 में हुआ। “उलगुलान की आग’ हमारे स्वाधीनता संघर्ष के एक ऐसे सैन्य नायक पर आधारित काव्य है जिसे हमारे विशाल जनजातीय समाज ने भगवान का दर्जा दे रखा है। स्थापित कवि चेतन जी ने अपने इस प्रबंध कार्य में बिरसा मुंडा के बहाने स्वाधीनता, राष्ट्रीयता और सांस्कृतिक चेतना के विभिन्‍न प्रश्नों से हमें संपृक्त किया है। “’उलगुलान” की यह आग जीवन मूल्यों की तपन के साथ भविष्य के सपने उगाती है। यही इस कृति की विलक्षणता है।

न्यायमूर्त्ति विक्रमादित्य प्रसाद ने भी झारखंड के भगवान कहे जाने वाले बिरसा मुंडा के व्यक्तित्व और कृतित्व पर एक 15 सर्गों में महाकाव्य लिखा है। यह प्रबंध काव्य भी बिरसा के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केन्द्रित है। वनवासियों के सिरमौर वीर बिरसा मुंडा का संघर्षमय प्रेरणाप्रद जीवन सबके लिए अनुकरणीय है। उन्होंने अपने युग का प्रश्न समझा था, उस युग की पीड़ा पहचानी थी —

कुछ प्रश्न बहुत छोटे होते, युग प्रश्न मगर बन जाते हैं।

©डॉ जंग बहादुर पाण्डेय, राँची

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