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कहानी संग्रह: झांनवाद्दन

पुस्तक समीक्षा

निर्देश निधि जी स्त्री पात्रों को रचते हुए पूर्वाग्रह से ग्रसित नहीं रहतीं। यहाँ स्त्री नायिका भी है खलनायिका भी। शोषित भी है और शोषक भी! इन चरित्रों की सबसे खूबसूरत बात यह है कि चरित्र गढ़े हुए न लग कर सहज रूप से कहानी में अपनी जगह पाते हैं।

एक ओर ‘झांनवाद्दन’ की रेशमा है और दूसरे छोर पर ‘लावण्या एक विजेता?’ की लावण्या मैडम। इनके मध्य अपना कम्फर्ट ज़ोन स्वयं निर्मित करती ‘हाँ बाबा मैं ही आई हूँ’ की चुन्नी।

कहानी जिस परिवेश में लेखक के सामने आ खड़ी होती है, उसी रूप में लिखना स्मृतियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन होते हुए भी कभी-कभी प्रवाह में बाधक हो जाता है। पाठकों और समीक्षकों का खूब स्नेह पाई झांनवाद्दन के आरंभ में हिंदू मुस्लिम का उल्लेख व वर्णन अनावश्यक लगा किन्तु कहानी के आगे बढ़ने के साथ ही लेखिका और पाठक दोनों ही धर्म के रंग भूल केवल वेदना की तरलता में डूबते जाते हैं। प्रथम दृष्टि में मुख्य पात्र रेशमा और मुख्य खलनायक अजीजुद्दीन और उसका बेटा प्रतीत हो सकते हैं किंतु ध्यान से सुनने पर ‘छोड़ दे रे अजीजा’ की हृदयविदारक ध्वनि में केवल अजीजुद्दीन ही नहीं हमारा भी नाम शामिल है।

विचारणीय है कि हँसता- मुस्कुराता सौंदर्य से भरा जीवन हमारी उपस्थिति में कातरता की अनुगूंज में परिवर्तित हो जाता है और हम कुछ कर नहीं पाते। दोषी समाज है। अजीजुद्दीन दशानन का केवल एक चेहरा।

हर ओर से निराश हो कर रेशमा अपने दोषी को जब स्वयं सज़ा देने का निर्णय लेती है, उसके पश्चात उस पर होने वाले अमानवीय ज़ुल्म और अधिक बढ़ जाते हैं। वह पागल साबित कर दी जाती है। गलियारे का मनोरंजन बन जाती है किंतु यह आघात उस रात बंद कोठरी में हुए आघात से बुरे न थे।

जैसा कि कहा जाता है कि लेखन में विषय की मुखरता नहीं होना चाहिए वैसे ही निर्देश जी की कहानियों में सामाजिक विसंगतियां दबे पाव उजागर होती रहती है। रेशमा और रईसुद्दीन के मध्य प्रेम अन्य औरतों की ईर्ष्या का कारण हो जाता है। औरों को मिलता सुख हमारे दुख की हमसे चुगली जो करने लग जाता है। हम अपने दुख से नहीं औरों के सुख से अधिक दुखी होते हैं। मैं समझती हूं कि यह ईर्ष्या उन अतृप्त स्त्रियों के दुखों का रूपांतरण है। जिन स्त्रियों को रेशमा से सहानुभूति थी, उसकी उग्रता के पश्चात वे भी उसे दोषी समझती हैं। स्त्री दया की पात्र हो सकती है, शोषण की वस्तु भी किन्तु न्याय की अधिकारिणी नहीं।

रेशमा को अथाह प्रेम करने वाला रहीसुद्दीन बेहतर जीवन की लालसा में उसे छोड़ चला जाता है।

निर्देश जी लिखती हैं- ‘शायद उसने रेशमा से प्रागैतिहासिक युग के उस गुरिल्ले जैसा ही प्रेम किया था जो मादा की गंध मात्र के पीछे पागल होकर सन्तति निर्माण हेतु एक निश्चित समय के लिये ही जोड़ा बनाता होगा। इन्सानी विकास के अनगिनत वर्षों बाद भी गंध से रूप तक का ही सफर तय कर पाया था ये रईसुद्दीन नाम का गुरिल्ला।’

रईसुद्दीन अपने परिवार पर भरोसा कर रेशमा को छोड़कर जाता है किंतु भेड़िए जंगल में कम और हमारे घरों के भीतर अधिक है।

रेशमा गुहार लगाती है-
“ए अफसर की बेट्टी, अफसर से कहना कि मुजै अजीजा से छुडवा दें।

जब समाज में दम नहीं किसी रेशमा को अजीजा से छुड़वाने का … अजीजा को दंड देने… का तो हर रेशमा का झांनवाद्दन बनकर अजीजुद्दीन को दंडित करना ही बेहतर होगा।

निर्देश जी लिखती है, ‘एक थी रेशमा जिसे मैं कभी भूल नहीं सकती।’ पढ़ने के बाद पाठक भी रेशमा को भूल नहीं पाता।

‘लावण्या एक विजेता?’ की लावण्या व्यापारी है… कुशल शिकारी है। वह भयावह रात से डरने की बजाय उसके अंधेरे और भयावहता से लाभ उठाने की जुगत सोचती है। उसे कोई गुरेज नहीं यूज़ किए जाने से, गुरेज अगर है तो थ्रो होने से है।

एक विजेता के पश्चात लगा प्रश्नचिन्ह आगे की कहानी कहता है कि राजनीति सच में जंगल है। कभी कहीं किसी और समय बड़े शिकारी से लावण्या का सामना जरूर होगा।

‘मैं ही आई हूं बाबा’ की चुन्नी न समाज के नियमों से चलती है, न मुखर बगावत करती है, न इन बेड़ियों को तोड़ने के षड्यंत्र रचती है। इसी समय में रहते हुए वह चुपचाप अपनी जगह बनाती जाती है। वह वे सारे काम करती है जो घर में लड़के करते हैं। डाँट खाती है, हँसती है और मोटरसाइकिल और ट्रैक्टर चलाते हुए अपनी राह पर बढ़ती जाती है। समाज की आँखों की किरकिरी बनती है किंतु धैर्य नहीं हारती। उसके यह प्रयास तब सार्थक प्रतीत होते हैं जब दादी और माँ का अप्रत्याशित समर्थन उसे सहज मिलने लगता है।

‘लौंडिए भी म्हारी हैं, खांगे हम तो इनकी कमाई । तेरी मदद ही करी है , कोई बदनामी तो करा ना दई इसनै तेरी ।’

यह कहानी बताती है कि अपनी अपनी जगह कितनी ही लड़कियां स्त्रियों की स्थिति बदलने के लिए सार्थक प्रयास कर रही हैं।अंत में प्रधान द्वारा ‘ये बरचो….. न आती तो…. ‘ के अपूर्ण कथन में बदलते समय की दस्तक सुनी जा सकती है।

संग्रह की अन्य कहानियाँ भी महत्वपूर्ण विषयों को उठाती हैं।सहज सरल व भावपूर्ण यह कहानियाँ पाठक की स्मृति में सदा के लिए बसी रहती हैं।

डॉ निधि अग्रवाल

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