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इनकी सुरक्षा किसके हाथ …

एक बार फिर डॉक्टरों के साथ हिंसा की खबर कर्नाटक  और असम से आ रही है। इस राष्ट्रीय आपदा के समय या सामान्य दिनों में भी डॉक्टर्स की अहम भूमिका से सभी परिचित हैं। इस महामारी के दौर में जहां लोगों से ज्यादा तकलीफदेह सम्वेदना का मरना है। जब अपनों के संक्रमित शरीर को कांधा देने से भी कुछ लोग मुंह मोड़ते दिख रहे हैं। वैसे में इनका इलाज डॉक्टर्स ही तो करते हैं। दिन- रात अथक परिश्रम कर ऐसे खतनाक माहौल में अपनों से दूर रहकर अपने पेशे को ईमानदारी से निभा रहे हैं। यहाँ तक कि उनके बीमार परिजन या रिश्तेदारों को भी बेड नहीं मिल रहा और उनके सामने किसी पहुँचवाले को वो बेड दे दी जाती है। और बिना राग- द्वेष के वे मरीजों का इलाज करते- करते ‘कंटेजीअस डिजीज’ के सम्पर्क में आकर अपनी जान भी गवां बैठते हैं। अपने पेशे पर न्योछावर होने वाले इन डॉक्टर्स की कहीं कोई गिनती नहीं है।

अरे! इनपर फूल बरसने की जरूरत नहीं है बल्कि इनकी सुरक्षा की जरूरत है। इस सुरक्षा की गारंटी न केवल जनता अपितु सरकार को भी देनी होगी। डॉक्टर्स के सुरक्षा को लेकर एक बिल पास होनी चाहिए। ताकि ये एक सुरक्षापूर्ण वातावरण में बिना मानसिक दबाव के काम कर सकें।

डॉक्टर्स की भी अपनी सीमाएं हैं। सीमित संसाधनों में वो जितना कर सकते हैं, अवश्य करते हैं। प्रयास उनका होता है जान बचाना तो ईश्वर के हाथ में हैं। अगर कहीं चूक होती है तो वे भी इंसान हैं। हॉस्पिटल में हुए किसी भी अनहोनी या दुर्घटना में व्यक्ति को लगता है कि डॉक्टर ने पैसे के लालच में ऐसा किया या वैसा किया। लेकिन किसी का भी ध्यान मैनेजमेंट पर नहीं जाता। जिनके निर्देश पर ये सब होता है। लोगों को या सरकार को क्या लगता है कि कुछ रुपये फीस के या सैलरी के पैसों से उनके द्वारा किये गए अमूल्य सेवा व समर्पण का भुगतान हम कर पाते हैं? इस कोविड पीरियड में इन्टर्नस से ‘अंडरपेड’ काम लिया जा रहा है। एक भविष्य में होनेवाले डॉक्टर की जान की कोई कीमत नहीं। कितने खतरनाक स्थिति में ये काम कर रहे हैं तथा अपने भविष्य को लेकर ये स्वयं तथा इनके परिजन सपनें संजो रहे हैं। किन्तु ऐसे में जगह- जगह से डॉक्टर्स के साथ समय- समय पर मारपीट की घटनाएं अत्यंत निंदनीय तथा असहनीय है। कोई भी ‘नॉन मेडिको’ डॉक्टर्स के साथ हुए हिंसा के खिलाफ जुबान नहीं खोल रहें। लेकिन जैसे ही कोई स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानी आएगी तो अपने कांटेक्ट में डॉक्टर को ही ढूंढेंगे। पुलिस सेवा, कानून के क्षेत्र में या अन्य ऐसे क्षेत्र में जिनके ऊपर हाथ उठाने पर सजा का कानूनी प्रावधान है। ऐसे में क्या डॉक्टर्स के साथ ‘असाल्ट’ होने पर ऐसे ही प्रावधान की आवश्यकता नहीं है? अगर ये अपने साथ हुए अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाते हैं या स्ट्राइक करते हैं तो इसपर सरकार द्वारा उचित ध्यान नहीं दिया जाता बल्कि उनपर उल्टा दबाव बनाया जाता है कि वे काम पे तुरन्त लौटें वरना उनका लाइसेंस रद्द कर दिया जाएगा। जरा सोचें इनके एक दिन के स्ट्राइक से कितनों की जान जा सकती है। हुए न कितने महत्त्वपूर्ण ये? इन जीवनदाताओं का काम किसी और से नहीं कर सकते। फिर इनका वास्तव में सम्मान कीजिए। न! न! केवल सम्मान नहीं बल्कि इनके काम का उपदान भी दीजिए।

 

©डॉ. उर्मिला शर्मा, हजारीबाग, झारखंड                       

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