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साहित्य जगत में छोटी सोच …

साहित्य जगत में बड़े बुध्दिमान और कल्पनाओं से परे लोग हैं, जहाँ तक देखा गया है। पर इस साहित्य जगत की भीड़ छोटी दुनिया से ही शुरु होकर बड़ी बनती है, मगर इस भीड़ में पहले सभी युवा होते हैं बाद में ही बडे साहित्यकार बनते हैं लेकिन हर जगह खुद को बडा साबित करने में जुटे है लोग।

पर सभी की अपनी-अपनी जगह बनती है अपनी लेखनी के अनुसार, या रूप में, सभी आगे आना चहाते हैं नम्बर १ पर, परन्तु उसमें छोटे युवा भी शामिल हो सकते है लेकिन हैरत की बात ये है कि कोई किसी को आगे बढता नहीं देखना चहाता है। ये अफसोस की बात है। जहाँ तक सवाल उठता है कि बडे साहित्यकार छोटे साहित्यकारों को पढ़ते नहीं है ये लोगों का मानना है लेकिन मुझे लगता है ये गलत है कि पढ़ते नहीं हैं, पढ़ते हैं परन्तु लाइक या उस पर कोई टिप्पणी कंमेन्ट नहीं करते है, पर उनके विषयों में से कुछ विषय जरूर अपने अन्दर शामिल कर लेते हैं कुछ कहानी उपन्यास या नई अपनी रचना लिखने के लिये। रचनाकार की, उसकी रचनाएँ तो लोगों को बेहद पसन्द आईं। कुछ लोगों ने सराहीं भी लेकिन इतना उत्पात मचा दिया फेसबुक मंच पर की उसे ठहरने नहीं दिया गया वो उसकी गलती है कि उसने हार मान ली और id बन्द कर दी। उसे ऐसा नहीं करना था सामना करना था अपनी पहचान और पीडा के लिये।

वो जो भी हो नहीं जानते है उसे लोग पर ये गलत है इस विषय पर बबाल करने से ऐसा महसूस होता है कि लोग खुद को कही पीछे खडा महसूस करने लगे थे या डर था उनमें कि कही उसे चुन न लिया जाये किसी अवार्ड के लिये और लोग पीछे रह जायें। किसी अवार्ड में शामिल होने के लिये, अपनी प्रतिभा और लेखनी पर भरोसा रखना चाहिए। मेरा मानना है कि समाज में परिवर्तन लाने के लिये खुद में परिवर्तन लाना जरूरी है।

स्त्री विमर्श पर चर्चा करने बाले लोग क्या पूर्ण रुप से हर उस स्त्री के साथ हैं जो असहाय, मजदूर, मजबूर, पीडित हर वर्ग से जुडी हो, या फिर केवल उन पीडित स्त्रियों के साथ हैं जो केवल समर्थ तो है पर किसी न किसी कारण पीडित है। अगर ऐसा है तो स्त्री विमर्श पर बात करने बाले लोग दोहरी मानसिकता जीते है। क्योंकि स्त्री छोटे वर्ग से हो या बडे वो केवल पीडित स्त्री है उसका साथ देना स्त्री विमर्श पर बात करने बालों का पूरा सहयोग होना चाहिये। तभी स्त्री की नीव मजबूत बनेगी, केवल अपने विषय पर सोचने बाले लोग उस पीडा़ से नहीं जुड सकते। अगर लडाई है स्त्री जीत और विमर्श पर तो पूर्ण रुप से होनी चाहिए।

केवल खुद को आगे खडा़ रखने के लिये नहीं।

साहित्य को इतना बौना न बनाया जाये उसका सम्मान करो केवल अपनी जीत और हार के लिये न लडे।

कुछ बदलने के लिये लडाई को जारी रखें, समाज का कल्याण करने के लिये खडे हों न कि केवल अपनी पहचान के लिये।

स्त्री को स्त्री काल बना कर उसे औंधे न गिरने दें उसकी दशा और दिशा दोनों को सम्मान दें।

केबल खुद के लिये साहित्य से रिश्ता न बनायें, समाज को बदलने के लिये साहित्य का खुद से रिश्ता बनाये।

 

©शिखा सिंह, फर्रुखाबाद, यूपी

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