मंथन …

 

मनुष्य ! तू इतना क्रूर क्यों है ? आज फिर सवाल और फिर अथाह मंथन, केरल की झकझोर देने वाली घटना और हम सभी की संवेदनाओं का गुबार कहाँ जाए ? क्या करे ? किससे पूछे ? 

खूंखार, नख-दंत विहीन मानव पृथ्वी पर राज करने लगा अपने खूंखार इरादों से, भाषा विकसित कर बाकी सभी जीवन के चिन्हों को बेज़ुबान की श्रेणी में डाल दिया। विभिन्न जानवरों को अपना प्रतीक बताकर फिर उस पर मर मिटने को तैयार मानव उन्हीं प्राणियों की जान लेने पर आमादा है और उस कथित बेज़ुबान को खबर तक नहीं। 

ताज़ा घटना इस तरह की घटनाओं की श्रृंखला की बस एक कड़ी है, सवाल उठ खड़े हुए हैं, पूछे जा रहे हैं। ध्यान रहे मीडिया मोहिनी रूप धरकर सहूलियत भरे सवाल और जवाबों से तुष्ट ना कर दे। पूछना तुम सवाल मेरे मन अपनी पुरानी भ्रांतियों से जिसमें जानवरों का उत्पीड़न मान्यताओं के साये में पलता है। 

जानवरों के साथ हमारा रिश्ता हमेशा ऐसा नहीं था। हमारी कथाओं में मनुष्य और जानवरों के सहवास की उनके स्वाभाव और व्यवहारों से सीख लेने की कई कहानियां बिख़री पड़ी हैं, पंचतंत्र इसका ख़ूबसूरत उदहरण है, यह मीठा रिश्ता अब कड़वाहट में बदलने लगा है, जब से हमने उनके घरों में कब्जा शुरू किया है। 

हमें अपने कदम पीछे खींचने ही होंगे, उन्हें उनका अधिकार देना ही होगा, वर्ना हम किसान को कोसने और जानवरों के प्रति संवेदना प्रकट करने के आगे नहीं बढ पाएंगे। 

©वैशाली सोनवलकर, मुंबई