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कोरोना में मानसिक तौर पर पस्त हो रहीं औरतें …

कोरोना महामारी ने न सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर बातचीत की पहल की है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मसलों को भी एक नया मंच दिया है। मौजूदा दौर को इस लिहाज से हेल्थ इमर्जेंसी ही नहीं मानसिक स्वास्थ्य महामारी का दौर भी कहा जा सकता है। यह वो महामारी है जिसे फिलहाल हम देख नहीं पा रहे जो अदश्य है, ढकी छुपी है। महामारी के शुरूआती दौर से ही करीब-करीब हर उम्र के लोगों में इसका एक अजीब सा डर बना हुआ था। वो एंजाइटी बच्चों, जवानों और बुजुर्गों सभी में थी और यह डर अब कोरोना की दूसरी लहर में और ज्यादा तेजी से फैल गया है। एंजाइटी (हल्की से लेकर गंभीर), डिप्रेशन, स्ट्रेस, मूड में उतार-चढ़ाव, सब्सटैंस यूज डिसआर्डर और इंसोमनिया जैसी मानसिक परेशानियों से आज हर इंसान जूझ रहा है, लेकिन इसका सबसे ज्यादा असर पड़ा है औरतों पर और उनमें भी जो ‘वर्क फ्राम होम’ और ‘वर्क फॉर होम’ दोनों कर रही है।

दिल्ली में रह रही 45 साल की साची अभी तक अपनी नौकरी में काफी खुश थी फिर कोरोना आया कुछ महीने साची ने सबकुछ झेला और फिर आखिर वो दिन भी आया जब कंपनी ने घाटे की आड़ में छंटनी शुरू की। करीब एक महीना डिप्रेशन और इंसोमनिया के बाद साची ने 40 फीसद कम तनख्वाह पर भी काम करना मंजूर किया। बात नही बनी और आखिरकार साची को नौकरी से इस्तीफा देना पड़ा। इस बीच एंजाइटी, स्ट्रेस और डिप्रेशन के कई दौर आए जो खुद को आइसोलेट करके तब गए जब एक दूसरी फर्म में साची को कम पैसे की एक और नौकरी मिली। हालांकि, साची अब नौकरी में तो है लेकिन अपने कामकाजी भविष्य को लेकर नाउम्मीद है। ह्यूमन सॉलिडैरिटी फाउंडेशन की कोरोनाकाल में मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं मुहैय्या कराने वाली मुफ्त टेलिसर्विस को-होप की मनोवैज्ञानिक और स्वतंत्र शोधकर्त्ता पूजा प्रियंवदा का कहना है, “लॉकडाउन से औरतों की मानसिक सेहत पर बुरा असर पड़ा ही है, बच्चे 24×7 घर पर हैं उनकी देखभाल, घर में सहयोग काफी कम मिलता है और ऐसे में नौकरी या काम जाने से जो आर्थिक अस्थिरता उनके जीवन में आयी है उससे बहुत महिलाओं को एंग्जायटी या डिप्रेशन जैसी परेशानियां होने लगी हैं।“

इसी तरह की नाउम्मीदी एक ही ऑफिस में अलग-अलग पदों पर काम कर रही चार मिड करियर नौकरीपेशा औरतों को भी है। इनमें से एक निशि का कहना है, ‘ऑफिस में हालात तो पूरे इस्तीफे के बन रहे हैं। जबकि हम वर्क फ्राम होम भी कर रहे है जो शुरू में तो जरूर अच्छा लगा था लेकिन अब काम को घर से संभालना और घर भी संभालना बहुत मुश्किल होता जा रहा है। मैं हर वक्त तनाव और स्ट्रेस में रहती हूं।‘ इसी दफ्तर की वसुधा ने माना कि ‘सुबह से शाम और रात तक घर से काम करने के बाद भी बॉस खुश नही रहता। फिर कामवाली के न आने से घर के काम का अलग बोझ बढ़ गया है। पिछले एक साल से हालत ये है कि न बच्चे को देख पा रही हूं, न घर को और न ही खुद को और बॉस भी खुश नहीं। पिछले एक साल से कई-कई दिनों तक मैनें डिप्रेशन फेस किया है और अब मैं बहुत नाउम्मीद हो गई हूं।‘

जेंडर वाइलेंस पर काम कर रही चेन्नई की संस्था प्रजन्या की फाउंडर स्वर्णा राजगोपालन का कहना है, ”लॉकडाउन में आई औरतों में आर्थिक असुरक्षा कई मानसिक बीमारियों को जन्म दे रही है जिसमें तनाव आम है और उसके बाद मानसिक बीमारियों का सिलसिला शुरू हो जाता है। क्योंकि जो नौकरियां औरतें खो रही है उन्हें दोबारा पाना बहुत मुश्किल है।” कामवाली सुशीला ने भी अपना दर्द कुछ इस तरह बयां किया,‘ लॉकडाउन से पहले तो सब ठीक चल रहा था लेकिन, लॉकडाउन में हमारे भूखों मरने की नौबत आ गई होती अगर हमारे कुछ घरों ने हमें पैसों और राशन से मदद न की होती तो। लॉकडाउन खुलने के बाद एक तो हमारे कई घर छूट गए कई साहब लोगों ने घर बदल दिए फिर जो पुराने घर थे उन्होंने पहले से भी कम पैसों पर हमें काम पर वापस रखा। आप बताओं हम कमरे का किराया, बच्चों की फीस और राशन का खर्चा कहां से लाएं। कई रातें तो जागते-जागते ही कट जाती हैं और कई बार इसी तंगी से घर में क्लेश भी होता है।‘

दिल्ली सरकार ने पिछले साल लॉकडाउन से पहले और लॉकडाउन के बाद “Socio-Economic Profile of Residents of Delhi” नाम से एक सर्वे कराया जिसके तहत दिल्ली में फरवरी 2020 में कुल वर्कफोर्स में 26 प्रतिशत औरते बेरोजगार हुई हालांकि लॉकडाउन खुलने के बाद फरवरी 2021 में यह आकंड़ा बढ़कर 40 फीसद तक पहुंच गया था। कोविड-19 के दौर में दिल्ली में कुल बेरोजगारी करीब 17.4 प्रतिशत तक बढ़ी। जनवरी-फरवरी, 2020 में यह दर 11.1 फीसद थी जो अक्तूबर-नवंबर 2020 आते-आते 28.5 फीसद हो गई। फिक्र की बात ये है कि जहां पुरूषों में सर्वे के दौरान बेरोजगारी 8.7 से 23.3 प्रतिशत तक बढ़ वहीं औरतों में यह दर 25.6 से 54.7 फीसद तक बढ़ी। यानी दिल्ली के इस सैंपल सर्वे में करीब 83 फीसद औरते कोविड-19 के बाद या तो बेरोजगार हो गई या उन्हें दोबारा काम नहीं मिल पाया। इस सर्वे में सिकिल्ड, सेमी-सिकिल्ड और अन-सिकिल्ड सभी तबकों की औरतें शामिल हैं।

इसी तरह की एक और स्टडी दिल्ली में Institute of Social Studies Trust (ISST) ने अप्रैल-मई, 2020 में लॉकडाउन के वक्त कामकाजी महिलाओं पर की। इसमें संगठित और असंगठित दोनों ही सेक्टर की औरतों को शामिल किया गया था। जिस सैंपल साइज पर स्टडी हुई उसमें पाया कि 64 प्रतिशत औरतों को नौकरी से हटा दिया गया जबकि 18 फीसद औरतों की तनख्वाह कम कर दी गई और कुछेक को ही पोस्ट लॉकडाउन में नौकरी मिल पाई। तनवी जो एक बड़े गैर-सरकारी संगठन में फंडरेसिंग का काम करती हैं बताती हैं,‘लॉकडाउन के शुरूआती दिनों से ही काम का बोझ इतना बढ़ा दिया गया कि घर के एक कमरे को ही मैनें दफ्तर बना लिया। लेकिन, इस बीच मेरी आठ साल की बच्ची की ऑनलाइन क्लास, बूढ़े माता-पिता को वक्त पर खाना देना और कामवाली के न होने से मैं बहुत तनाव में रही और अब तक हूं।’ लॉकडाउन खुलने तक तनवी की तनख्वाह 30 फीसद तक कट चुकी थी जिससे वह बेहद नाखुश और नाउम्मीद थी क्योंकि तब तक ऑफिस ने छंटनी की लिस्ट भी बना ली थी। इस बारे में पूजा प्रियंवदा ने बताया, “औरतों पर हर तरह से भार दोगुना है, मर्द अगर पैसे या रोज़गार की जद्दोजहद में हैं भी तो भी घर में उन्हें सेवा मिल रही है, लेकिन अधिकतर औरतें दोनों लड़ाइयाँ लड़ रही हैं, इसके अलावा अनचाहे गर्भ, घरेलु हिंसा में वृद्धि, बच्चों बूढ़ों या बीमारों की सेवा और देखभाल का ज़्यादा बोझ भी औरतों पर है। कई औरतें कोरोना ग्रस्त होने पर भी गृहस्थी संभालती हैं। “

हालांकि, सिर्फ दिल्ली ही नहीं यह तस्वीर करीब-करीब हर शहर की कामकाजी औरत की थी। मार्च 2020 के बाद भारत में नौकरियों का संकट बद से बदतर होता चला गया। संगठित सेक्टर में काम कर रही महिलाओं में मानसिक तनाव की कई अलग वजहें थी जबकि असंगठित क्षेत्र की कामकाजी औरतों को अलग तरह के मानसिक दबावों में जीना पड़ रहा है। मसलन, संगठित सेक्टर की औरतों के लिए घर का खर्चा, मकान या कार के लोन की किस्त, लाइफस्टाइल में समझौता करना, बच्चों पर होने वाला अतिरिक्त खर्च कम होना तनावग्रस्त था वही दूसरी तरफ असंगठित सेक्टर की औरतों को कमरे का किराया, बच्चों की फीस और किताबें -कॉपी, राशन का खर्च और ऑनलाइन क्लासों के लिए स्मार्टफोन न हो पाने से पढ़ाई में आ रही दिक्कतें मायूस कर रही थी। वर्क फ्राम होम वाली औरतें न तो काम ही घर से ठीक तरह से कर पा रही है और न ही घर को ठीक से संभाल पा रही है।

इंश्योरेंस सेक्टर में काम कर रही अनु ने बताया कि न्युक्लीयर फैमिली होने की वजह से वह ज्यादा दिनों तक वर्क फ्राम होम नही कर पाई और मजबूरी में उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ी। अब परेशानी ये है कि सारा दिन पति को पत्नी और पत्नी को पति और बच्चे के साथ रहना पड़ रहा है जिसके कि पहले वे आदी नही थे। उसपर घर के काम का और बच्चे की ऑनलाइन क्लास करवाने का बोझ दिमागी तौर पर अनु को लगातार परेशान कर रहा है। पूजा प्रियवंदा का कहना है कि, “इस हालात का शार्ट टर्म नुकसान यह है कि इससे औरतों की फिजिकल हेल्थ, आपसी रिश्तों पर फ़र्क़ पड़ रहा है लेकिन लॉन्ग टर्म में कई शादियों में अलगाव, कई परिवारों में हिंसा की शुरुआत या वृद्धि भी देखी जा रही है जिससे पहले से ही ख़राब मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति और बिगड़ती नज़र आती है।“

दरअसल, कोविड से पहले की जिन्दगी में सबके पास अपना एक निजी वक्त होता था। क्योंकि औरतें भी घर से बाहर जा रही होती थी तो उनकी भावनाओं की शेयरिंग भी हो जाती थी, लेकिन लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग के जमाने में अब ये होना मुमकिन नहीं लिहाजा घरों में बंद औरतों में तनाव, मूड स्विंग, डिप्रेशन और एंजाइटी तेजी से फैला। हालांकि, यह सुनने में बड़े हल्के शब्द लगते हैं लेकिन दरअसल यही हालात आगे चलकर गंभीर मानसिक रोगों की जड़ बनते है। पूरे वक्त चार दीवारी में बंद रहकर ऑफिस का, घर का या दोनों जगह का काम करना औरत के लिए न सिर्फ मानसिक बल्कि शारीरिक और भावनात्मक तौर पर भी मुश्किल होता जा रहा है। नौकरी जाने या तनख्वाह कटने से घर में जो आर्थिक तंगी आ रही है, उन औरतों का मानसिक संतुलन और ज्यादा बिगड़ सकता है जो छोटे घरों में रह रही हैं या जिनके घरों में बड़ी बालकनी या धूप और हवा के लिए खुली जगह नही है या कम है। इसके अलावा जिन औरतों ने अपने परिजनों को महामारी में खो दिया या जिन्हें लॉकडाउन के दौरान किसी भी तरह की स्वास्थ्य या सामाजिक सेवा में रुकावट आई हो उन सभी औरतों को मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों से जूझना पड़ रहा है। बाद इसके अगर घरेलू हिसां घर में हो तो यह तनाव एक ही झटके में कहीं गुना ज्यादा बढ़ जाता है। यही वजह है कि पिछले साल संयुक्त राष्ट्र वीमेन (यूएन वीमेन) ने दुनियाभर की सरकारों से लॉकडाउन के दौरान बढ़ रही घरेलू हिसां को काबू करने और औरतों को हर हाल में राहत पहुंचाने की अपील की थी। राष्ट्रीय महिला आयोग के आंकड़ों के मुताबिक आज से ठीक एक साल पहले इसी दौरान यानी 25 मार्च से 31 मई के बीच आयोग ने कुल 1,477 घरेलू हिंसा की शिकायते दर्ज की थी जो 2020 अप्रैल के मुकाबले 2.5 गुना ज्यादा थी।

यह हकीकत है कि किसी भी तरह के आर्थिक संकट का असर औरतों पर ज्यादा पड़ता है। और वैसे भी औरत जो घरेलू काम करती है उस काम की कही कोई गिनती नही होती। नेशनल सटेटिस्टिकल ऑफिस के सर्वे Time use in India-2019 के मुताबिक औरते घर के काम-काज में करीब पांच घंटे वक्त देती हैं। और कोरोना में घरेलू भी और कामकाजी दोनों ही औरतों का घरेलू काम कहीं गुना बढ़ा है। स्वर्णा राजगोपालन का कहना है, “ऐसा इसलिए भी होता है कि हम आज भी पुरुष प्रधान समाज में रह रहे हैं जहां मर्दो का घर का काम न करना बड़ा आम है। आदमी घर में वही काम करता है जिसमें वह घर के बाहर जा सके। वो केयर टेकर की तरह काम नहीं करता। उन्होंने बताया कि यह सिर्फ एक सोशल क्लास की ही बात नही है बल्कि हर क्लास में ऐसा ही होता आ रहा है।“

कोरोना से पहले यूएन वीमेन रिपोर्ट का कहना था कि दक्षिण एशिया में 2021 तक औरतों में करीब 10 फीसदी गरीबी आ सकती है लेकिन, अब इसके बढ़कर 13 प्रतिशत तक पहुंचने की उम्मीद है। रिपोर्ट ने 2030 तक अनुमान दिया है कि दक्षिण एशिया में पूरी दुनिया की सबसे गरीब औरते और लड़कियां रह रही होगीं मसलन पूरी दुनिया की गरीब औरतों की करीब 18.6 फीसद। इस हालात से वक्त रहते उबरने के लिए स्वर्णा राजगोपालन का मानना है, “सक्षम औरतों को मदद के लिए आगे आना होगा। चाहे वह सीएसआर के तौर पर हो या उन्हें सीधेतौर पर कोई रोजगार, अनुदान या स्किल देकर। क्योंकि इसी के जरिए वर्कफोर्स में औरत-मर्द के हिस्सेदारी की बढ़ती खाई को रोका जा सकेगा।“ हालांकि, पूजा प्रियवंदा का कहना है, “आर्थिक सुरक्षा एक दोधारी तलवार है, औरत को अगर नौकरी करनी है तो उसके अपने मानिसक बोझ और तनाव हैं, लेकिन अगर वो आर्थिक रूप से पूरी तरह से आश्रित है तो उसकी अपनी चिंता, औरतें कहीं भी आज़ाद या सुरक्षित नहीं। आर्थिक या अन्य ज़िम्मेदारियां जो भी हो मानसिक स्वास्थ्य को ठीक रखे बगैर इन्हें पूरा कर पाना असम्भव है इसलिए इस पर ध्यान देना ज़रूरी है।“ हैरानी की बात है कि कोरोना में इन औरतों के खोते हुए रोजगार और उससे उनकी मानसिक सेहत पर पड़ रहे असर पर हाल-फिलहाल में कोई रिपोर्ट, अध्ययन या सर्वे अब तक सामने नही आया है। वक्त रहते हमें इस अदश्य महामारी को फैलने से रोकना होगा यह समझते हुए कि मानसिक तौर पर सेहतमंद औरत ही सेहतमंद परिवार और समाज की नींव होती है।

 

 

 

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