मध्य प्रदेश

कार्तिक पूर्णिमा पर दीपदान किया, फूल डाले, शिप्रा नदी का पानी फिर प्रदूषित, शिप्रा नदी में स्नान करने डेढ़ लाख से अधिक श्रद्धालु पहुंचे, दीप के साथ फूल और कागज के पुष्टे आदि से पट गया शिप्रा का रामघाट ….

उज्जैन। शहर के गंदे नालों का पानी मिलने से प्रदूषित मोक्षदायिनी शिप्रा नदी बुधवार को आस्था के फूल से और अधिक मैली हो गई। सुबह रामघाट पर नदी का नजारा देख पर्यावरण प्रेमी आहत हुए। हालांकि शाम तक नगर निगम के अमले नदी की सतह पर पड़ा कचरा उठाकर बाहर निकाल फेंक दिया मगर नदी में नालों का पानी मिलना नहीं रूका।

मालूम हो कि कार्तिक पूर्णिमा पर शिप्रा नदी में नहान करने डेढ़ लाख से अधिक लोग पहुंचे थे। कईयों ने पुण्य की कामना से शिप्रा नदी में दीपदान किया था। दीप के साथ फूल और कागज के पुष्टे आदि भी नदी में अर्पित किए थे। रात में दीपों की रोशनी से नदी का नजारा काफी खूबसूरत दिखाई दे रहा था, मगर सुबह नजारा उलट रहा। नदी में अर्पित की सारी सामग्री सतह पर तैर रही थीं। घाट पर दुर्गंध फैली थी। स्नान करने आए लोग नदी में कचरा देख काफी नाराज हुए। नगर निगम के अमले ने कड़ी मशक्कत के बाद सतह पर जमा सारा कचरा बाहर कर नदी को साफ किया। मालूम हो कि एक दिन पहले महापौर मुकेश टटवाल ने शिप्रा नदी में नालों का पानी सीधे मिलने से रोकने को स्थापित सभी नौ पंपिंग स्टेशन का निरीक्षण किया था। उन्होंने पंपिंग स्टेशन चालू करने के निर्देश दिए थे और फंड की कमी दूर कराने का आश्वासन दिया था।

उल्लेखनीय है कि गऊघाट, मंछामन, जूना सोमवारिया और आयुर्वेद कालेज के पास बना पंपिंग स्टेशन वर्तमान में चालू है, जबकि रूद्रसागर स्थित गणगौर दरवाजा, रामघाट, चक्रतीर्थ, भैरवगढ़, बड़नगर रोड पुल के पास नजदीक बना पंपिंग स्टेशन बंद है। कारण बंद पंपों की मरम्मत कराने के लिए फंड न होना है। नगर निगम की रिपोर्ट के अनुसार लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग द्धारा शहर में रोज 150 एमएलडी पानी घरेलू इस्तेमाल के लिए प्रदाय किया जाता है। इसमें से 93 एमएलडी पानी सीवरेज के रूप में विभिन्न नाले-नालियों के माध्यम से पंपिंग स्टेशन और यहां से पाइपलाइन के जरिये सदावल ट्रीटमेंट प्लांट पहुंचता है। यहां पानी का प्राकृतिक तरीक से उपचार होता है। इस उपचारित पानी का इस्तेमाल किसान सिंचाई एवं मछली पालन में कर रहे हैं।

शिप्रा शुद्धी के लिए नगर निगम ने बजट में पांच करोड़ रुपये का मद रखा है। पिछले वर्षों में मद सवा सात करोड़ रुपये था। अफसरों का कहना है कि साढ़े सात करोड़ रुपये की देनदारी चुकानी है। हर साल बिजली बिल पर तीन करोड़ रुपये खर्च होते हैं। दो करोड़ रुपये कर्मचारियों के वेतन और अन्य छुटपुट मैंटेनेंस कार्य पर खर्च होते हैं। बिते डेढ़ वर्ष में पीएचई एक निविदा तक नहीं निकाल पाई। उधारी इतनी है कि कोई ठेकेदार बगैर रुपया दिए नया काम करना नहीं चाहता। बजट में मद है मगर खर्च करने को पैसा नहीं। शिप्रा शुद्धी और पीएचई के जरूरी काम कराने के लिए 12 करोड़ रुपये की जरूरत है। प्रस्ताव महापौर परिषद को रखा है। शिप्रा शुद्धी पर साल 2020 में 6 करोड़ 33 लाख रुपये और साल 2021 में 4 करोड़ 90 लाख रुपये खर्च हुए थे।

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