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ट्रांसजेंडर्स के मानसिक स्वास्थ्य पर भी जरूरी है बहस …

जून, 2020 में उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में 16 साल के एक लड़के ने आत्महत्या की। अपने सुसाइड नोट में पिता से माफी मांगते हुए उसने लिखा कि उसकी लड़कियों की तरह शक्ल थी और लोग इस बात पर उसका मजाक उड़ाते थे। यहां तक कि उसने खुद को किन्नर समझना भी शुरू कर दिया था जिसकी वजह से उसने यह कदम उठाया। ये बच्चा निम्न मध्यम वर्ग का था जिसपर लॉकडाउन का भी असर था लेकिन, इस बच्चे की जान किसी भी तरह के आर्थिक संकट ने नहीं बल्कि समाज के बेरहम रवैये ने ली। उसके पिता ने भी यह बताया कि रिश्तेदार, स्कूल के साथी और आस-पड़ोस के लोग उसकी लैंगिक पहचान यानी जेंडर आइडेंटिटी पर सवाल करते थे और उसका मजाक उड़ाते थे और छेड़खानी (बुलिंग) करते थे। वो बच्चा जेंडर आइडेंटिटी का शिकार हुआ और उसी मानसिक तनाव में दुनिया से चला गया लेकिन, क्या उसकी सुसाइड से उठे सवाल भी यूं ही चले जाने देने चाहिए। नहीं बिल्कुल नहीं, समाज हत्यारे की भूमिका निभाएं ऐसा दुनिया की कोई भी सरकार इजाजत नही देती। और यह हक कोई भी इंसान समाज को भी नहीं देता कि समाज उसका लिंग तय करे।

आत्महत्या या खुदकुशी एक बड़ी पेचीदा स्थिति है जिसमें शारीरिक और मानसिक समेत कई और कारणभी जिम्मेदार होते हैं। सौम्या गुप्ता को भी कभी इसी तरह आत्महत्या का ख्याल आता था और यह ख्याल एक बार नहीं बल्कि कई बार आता था क्योंकि समाज आज भी ट्रांसजेडर यानी पारलैंगिक लोगों को स्वीकार करने में हिचकता है। सौम्या गुप्ता पारलैंगिकों पर काम करने वाली दिल्ली की एक संस्था हमसफर ट्रस्ट में डिप्टी प्रोग्राम मैनेजर हैं। साइंस की विद्यार्थी और खुद ट्रांस वुमैन सौम्या ने बताया, “पारलैंगिकों को समाज में भेदभाव का सामना हमेशा से करना पड़ा है। करीब 12-13 साल की उम्र से ही यह भेदभाव शुरू हो जाता है जब बच्चे किशोरावस्था में पहुंचने शुरू होते हैं। घर में भेदभाव और दमन की वजह से अक्सर इसी उम्र में ये बच्चे घर से भी भाग जाते हैं। बाहरी दुनिया का बुरा बर्ताव, हिंसा और घरवालों की अनदेखी इनके मानसिक स्वास्थ्य पर बेहद बुरा असर डालते हैं।“ उन्होंने बताया कि यह भेदभाव इस कदर है कि आज भी इस समुदाय के लिए स्कूल, कॉलेजों से लेकर, स्वास्थ्य सुविधाओं, सार्वजनिक स्थलों, घर खरीदना या किराए पर लेना, नौकरियों और नागरिक के तौर पर जरूरी दस्तावेज लेने का भी समाज और संस्थाएं इस समुदाय को हकदार नहीं मानती।

2011 की जनगणना के मुताबिक देश की कुल आबादी में ट्रांसजेडर यानी पारलैंगिकों की तादाद करीब 4,87,803 है और जिसमें छह साल से कम उम्र के बच्चों की आबादी 54,854 है। यहां यह बताते चले कि आमतौर पर समाज में पारलैंगिकों को हिजड़ा, किन्नर वगैरह कहा जाता है लेकिन, यह ट्रांसजेडर का एक रूप है। दरअसल, ट्रांसजेडर या पारलैंगिक शब्द के तहत चार अलग-अलग तरह के लोग आते हैं- पहला, हिजड़ा या किन्नर जिसे तीसरा जेंडर या थर्ड जेंडर भी कहा जाता है दूसरा, ट्रांस मेन यानी वे लोग जिनके हाव-भाव मर्दों वाले होते हैं लेकिन जैविक रूप से वह औरत होते हैं तीसरा, ट्रांस वीमेन यानी वे लोग जिनके हाव-भाव औरतों वाले होते है लेकिन, जैविक रूप से मर्द होते हैं और चौथा और आखिरी, इंटरसेक्स। इन चारों ही समुदाय के लोगों को एक ही शब्द ट्रांसजेडर में समेटकर देखा जाता है जिसे यह समुदाय नैतिक तौर पर सही नहीं मानता। बहरहाल, देश की चार लाख से पार की ट्रांसजेड़र आबादी में आम आबादी की तुलना में आत्महत्या की दर और आत्महत्या की कोशिश की दर सबसे ज्यादा है। 2012 में एक अन्य लेख में छपे ‘Transgender Suicide Rates Continue to Rise’ में बताया गया कि भारत में ट्रांसजेडर की आत्महत्या की दर कुल आत्महत्याओं की दर की करीब 31 फीसदी है जिसमें अपने 20वें जन्मदिन से पहले तकरीबन 50 प्रतिशत ट्रांसजेडर आत्महत्या की कोशिश कर चुके होते हैं। अकेले कर्नाटक राज्य में ही हर साल 40-50 ट्रांसजेडर खुदकुशी करते हैं। हालांकि, ट्रांसजेडर आबादी को लेकर किसी भी आंकड़े को पैमाना बनाना सही नहीं होगा क्योंकि इस दिशा में सही तथ्यों और आंकड़ों की खासी कमी है।

स्वेतांबरा जो हमसफर ट्रस्ट, मुबंईकी प्रोजेक्ट मैनेजर-ट्रांससेंड है बताती है, “दरअसल, हमारा समाज ट्रांसजेडर समुदाय के साथ भेदभाव करता है, बुरा बर्ताव करता है उन्हें अपने से अलग समझता है और खुद में शामिल नहीं करता, उनके लिंग को लेकर उनपर फब्तियां कसना, हंसी उड़ाना, कभी उन्हें गाली के तौर पर छक्का या कुछ और कहकर चिढ़ाना और कुल मिलाकर उन्हें कभी भी नार्मल महसूस न होने देना उन्हें धीरे-धीरे अलग-अलग मानसिक बीमारियों और विकारों की तरफ धकेलता है।“उन्होंने बताया कि इस समुदाय के साथ भेदभाव ही इन्हें ढेरों मानसिक विकारों के मुहाने पर खड़ा करती थी, करती है और आज भी कर रही है। बेहद अफसोस की बात है कि समाज इस समुदाय को आज भी अपनी सामान्य जीवनशैली में अनफिट समझता है। इन्हें लगातार इस बात का एहसास दिलाया जाता है कि लिंग या तो मर्द होता है या फिर औरत। लिंग को समाज जिस चश्मे से देखता है वहां मर्द और औरत के अलावा …

 

©डॉक्टर अक्सा शेख, सहायक प्राध्यापक जामिया हमदर्द दिल्ली.

प्र. ट्रांसजेंडर समुदाय को किस तरह की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ता है?

. यह बात सही है कि ट्रांसजेंडर हाशिए पर खड़ा एक ऐसा समुदाय है जिसके पास स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच बहुत कम है। ट्रांसजेडर समुदाय के लोग अक्सर अपनी लैंगिक बेमेलता में खुद ही इतने उलझे होते हैं और उसपर समाज में उनकी अस्वीकार्यता इस समुदाय को खासी मानसिक बीमारियों की तरफ ले जाती है। अगर आप आंकड़ो को देखे तो पाएंगे कि खासतौर से डिप्रेशन और एंजाइटी आम आदमी की तुलना में ट्रांसजेंडर लोगों में काफी होती है। यही नहीं इस समुदाय के लोग सेल्फ हार्म और आत्महत्या की कोशिशे भी करते हैं बल्कि खुदकुशी भी करते हैं जिसकी दर यहां भी आम लोगों की बनिस्बत ज्यादा है। मादक पदार्थों, तंबाकू और एल्कोहल की लत की दर भी ट्रांसजेंडर समुदाय में ऊंची है। इसके अलावा एसटीडी से होने वाले एचआईवी और ट्यूबरक्लोसिस से भी इनके मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।

प्र. मानसिक स्वास्थ्य की बात की जाए तो किस तरह के आंकड़ों और तथ्यों पर काम करने की जरूरत है?

उ. सबसे पहले इंटरसेक्शनैलिटी फ्रेम को जानना जरूरी है। इस समुदाय में भी कई समुदाय है और सबके मानसिक सेहत के मसले अलग-अलग हैं। ट्रांसजेडर एक शब्द है जिसमें कई समुदाय आते है- ट्रांस मैन, ट्रांस वुमैन, ट्रांसजेंडर नॉन बायनरी वगैरह। इसके अलावा वे लोग भी है जिनकी अलग सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान है जैसे हिजड़ा घराना, किन्नर समाज, कोती, बन्ती, जोगता जोगती। इन सबकी मानसिक स्वास्थ्य की परेशानियां अलग है। फिलहाल इनके मुद्दों को साझे तौर पर ही देखा जाता है। मेरा मानना है कि इसमें से हरेक समुदाय के मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों पर अलग से शोध या अध्ययन होना चाहिए जोकि अब तक मौजूद नही है। दूसरा, इस समुदाय के बॉयोलॉजी वेरिएंसेस पर कहीं कोई अध्ययन नहीं हुआ। मोटेतौर पर कहा जाए तो इनके लिए पैथोलॉजी और फार्माकोलॉजी का फर्क और असर जानना बेहद जरूरी है। तीसरा, राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों या मानसिक स्वास्थ्य संबंधी कार्यक्रमों या नीतियों को बनाते वक्त इस समुदाय की कुछ खास जरूरतों को ध्यान में नहीं रखा जाता जो बेहद जरूरी है।

 

प्र. ट्रांसजेडर समुदाय में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी विकार एक बार ठीक होने के बाद दोबारा न लौटे आपकी नजर में इसका बेहतर हल क्या हो सकता है

उ. यह बात ठीक है कि एक ट्रांसजेंडर अपने बचपन से लेकर उम्र के हर पड़ाव में मानसिक विकारों या बीमारियों को झेलता है। मेरी नजर में इस समुदाय के लोगों को हर स्तर पर सम्मानजनक तरीके से मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सेवाएं लगातार मिलती रहनी चाहिए।

प्र. 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजंडर समुदाय की स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों के लिए एक  वेल्फेयर एजेंसी बनाने के निर्देश राज्यों और केन्द्र शासित राज्यों को दिए थे जिनकी लगाता अनदेखी होती रही। आपकी राय में इसकी क्या वजहें हो सकती है

उ. 2013 में ही दरअसल ट्रांसजेंडर समुदाय को पहली बार अपनी अलग पहचान मिली और  इनके हक और अधिकार की भी बात की गई। 2019 में ट्रांसजेंडर पर्सन (अधिकार संरक्षण) कानून बना, 2020 में ट्रांसजेंडर काउंसिल का गठन किया गया। इन सभी कानून और नीतियों ने  ट्रांसजेंडर समुदाय को उनका हक, अधिकार और सेवाएं मिले इसका माहौल पैदा किया लेकिन, जमीनी स्तर पर ऐसा हो नहीं पाया क्योंकि मेरी समझ से समुदाय की तादाद कम है और ये समाज सशक्त नही है। कानून के अमल में अनदेखी की वजह यह भी हो सकती है कि इस समाज में वोटर कम है और इनके हक की आवाज उठाने वाला भी कोई नहीं।

प्र. क्योंकि इस समुदाय पर खासकर इनके मानसिक स्वास्थ्य को लेकर ज्यादा रिसर्च या अध्ययन नहीं हुए हैं। क्या आपको लगता है कि इन लोगों के खुद आगे आकर अपने अनुभवों को समाज से साझा करने से तस्वीर कुछ बदल सकेगी।

उ. जब भी हम कोई स्वास्थ्य़ संबंधी नीति या कार्यक्रम बनाने की बात करते हैं उसके लिए कुछ प्रमाणों की कुछ शोध की जरूरत पड़ती है बात जब ट्रांसजेंडर समुदाय के मानसिक स्वास्थ्य की हो तो इसमें भी हमें इन चीजों की जरूरत होती है ताकि इस बात का पूरा ख्याल रखा जा सके कि ये नीतियां असल जिंदगी में भी कारगर हो। अनुभव साझा करना नीतियां और प्रोग्राम बनाने में बहुत मददगार साबित होते हैं।

कोई और स्वीकार नहीं। हालांकि, ये समुदाय लगातार खुद को समाज का हिस्सा बनाने के लिए जद्दोजहद करता रहता है।

 

समाज के स्टीरियोटाइप बर्ताव से परेशान होकर ही इस समुदाय के कितने ही लोग डिप्रेशन, अवसाद, तनाव, इनसोमनिया, आत्महत्या की कोशिश, अकेलापन, सेल्फ हार्म और नशीले पर्दाथों (तंबाकू, एल्कोहल) की लत का शिकार बनते है। समाज की नफरते और अनदेखी इस समुदाय में मानसिक विकारों के पैदा होने की बड़ी वजह बनती है। 2016 में लैंसेट साइकियाट्री में ‘Removing transgender identity from the classification of mental disorders: a Mexican field study for ICD-11’से छपे एक अध्ययन का जिक्र करना यहां सही होगा जिसमें बताया गया कि ट्रांसजेंडर दरअसल लिंग पहचान की वजह से नहीं बल्कि, समाज की दी गई यातनाओं और हाशिए पर धकेलने वाले रवैये से मानसिक रोगों के शिकार होते हैं। यह अध्ययन मेक्सिको सिटी में हुआ था। यही वजह है कि वहां ट्रांसजेंडर पहचान को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की ICD-10 (International Classification of Disorders)से हटाने पर जोर दिया गया है।

मुबंई की उमंग संस्था के को-फाउंडर राज कनोजिया बताते हैं, “हमारे समुदाय की तकलीफ और दर्द को हम बता तो देते हैं लेकिन, इसे समझ वही सकता है जिसपर  गुजरती है। हमें स्पेशल या अलग कहकर अलग मत करो न हम अलग है। हम समाज का ही हिस्सा है और बस इतना चाहते हैं कि समाज भी हमें अपना हिस्सा माने।“ राज ट्रांस मैन है और बताते है, “बहुत ही कम ट्रांसजेंडर किशोरों को अपने परिवार की मदद मिलती है। काफी बड़ी तादाद तो परिवार के सौतेले रवैये की वजह से ही घर से भाग जाते है। जरा सोचिए इस उम्र में न तो वे शैक्षिक और न ही वित्तीय तौर पर आत्मनिर्भर होते है तो उन्हें समाज में कितनी जायदतियां सहनी पड़ती होगी, इनके साथ हिंसा भी खूब होती है और इनका शारीरिक शोषण और बलात्कार भी होता है। इन सबसे बीच इनके मानसिक स्वास्थ्य का क्या हाल होता है यह किसी से छुपा नहीं है।“ उमंग संस्था LBT (Lesbian, Bisexual, Transgender) मुद्दों पर काम करती है और राज इसके अलावा भी मुबंई की ही कुछ और संस्थाओं से जुड़े हैं जो इसी समुदाय के लिए काम कर रही है।

हालांकि, यह बात सही है कि इनके स्वास्थ्य का मुद्दा या कोई भी मुद्दा अखबारों में अहम जगह नही पाता है। एचआईवी की जब बात होती है तो ही इस समुदाय का नाम लिया जाता है क्योंकि समुदाय में एचआईवी के मरीज सबसे ज्यादा है। 2017 में अमेरिकन जरनल ऑफ साइकियाट्री में ‘Understanding the Mental Health of the Hijra Women in India’ नाम से छपे लेख में डॉक्टर विकास जयदेव ने देश में हिजड़ों की दशा के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा है कि समुदाय की शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक सेहत भी लगातार खराब रहती है और इसलिए दोनों ही स्तर पर इनके लिए काम होना जरूरी है। क्योंकि भेदभाव और गड़बड़ाता शारीरिक स्वास्थ्य उन्हें मानसिक बीमारियों के कगार पर ले आता है। जब बात एचआईवी की हो सिर्फ तभी समुदाय की बात की जाए यह सही नही है। इसके अलावा अगर इनकी पढ़ाई की बात की जाए तो पिछले साल CBSE की प्रेस विज्ञप्ति को अगर देखे तो पता चलता है कि कक्षा 10वीं के कुल 1,889,878 बच्चे बोर्ड में बैठे जिसमें 19 ट्रांसजेंडर थे और कक्षा 12वीं के कुल 1,206,893 बच्चों में छह ट्रांसजेंडर थे। हर साल की तरह पिछले साल भी लड़के और लड़कियों के बेहतर प्रदर्शन और परसेंटेज को लेकर अखबारों में खबरें आई लेकिन, बीते सालों की तुलना में कक्षा 10वीं में ट्रांसजेंडर बच्चों की पास परसेंटेज में 15.79 प्रतिशत की और इसी तरह कक्षा 12वीं में ट्रांसजेंडर बच्चों की पास परसेंटेज में 16.66 फीसद की जो गिरावट आई वह कहीं भी इस पूरी चर्चा का हिस्सा नहीं बना। यह समुदाय की हमारे शैक्षिक सिस्टम में लगाततार अनदेखी की जाती रही है।

लंबे वक्त से अपने समुदाय के लिए काम कर रहे राज कनोजिया ने बातचीत में यह बताया कि ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए आज भी कितना मुश्किल है मेडिकल सेवाओं को हासिल करना और रही बात मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं की तो ये सेवाएं तो आज भी एक मामूली इंसान की पहुंच से दूर है इनका समुदाय तो सोचता ही नहीं। लेकिन उन्होंने ये भी माना कि ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए माहौल पहले से काफी बेहतर हुआ है। ट्रांसजेंडर पर्सन (अधिकार संरक्षण) कानून, 2019 आने के बाद सरकार ने भी इस समुदाय और इनके मुद्दों की तरफ ध्यान देना शुरू किया और यह तय किया कि इनको सभी मेडिकल सेवाएं मुहय्या हो। इनके लिए एचआईवी निगरानी केन्द्र और सेक्स रिएसाइंमेंट सर्जरीज समेत व्यापक मेडिकल सुविधाएं इनकी पहुंच में हों। 02 मार्च, 2021 में गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को कानून को अमल में लाने के निर्देश दिए हैं जिसके बाद दिल्ली पुलिस कमीश्नर ने दिल्ली में ट्रांसजेंडर लोगों के साथ होने वाली बदसुलूकी और अपराध को फौरन रजिस्टर, जांच और अभियोग के लिए एक निगरानी सेल स्थापित करने का आदेश दिया है जिसकी अध्यक्षता ज्वाइंट कमीश्नर ऑफ पुलिस करेगा। इन्हीं कानूनों की वजह से 2018 में लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद तमिलनाडु की 22 साल की ट्रांसजेंडर पुलिस अधिकारी ने आखिरकार अपने तीन सीनियर अधिकारियों को अपनी नाकाम आत्महत्या की कोशिश के लिए जिम्मेदार ठहराया। रामनाथपुरम जिले की यह पुलिस अधिकारी से उसके तीन वरिष्ठ अधिकारी बुलिंग करते थे और अक्सर भद्दे मजाक भी करते थे जिससे थककर उसने एक दिन चूहे मार जहर पी लिया, वह महिला अधिकारी न सिर्फ बची बल्कि उसने तीनों की शिकायत कर अपनी नौकरी भी बचा ली।

हालांकि, ट्रांसजेंडर ही नहीं इसी तरह के भेदभाव का LGBT समुदायों को भी सामना करना पड़ता है। समाज में उनका बहिष्कार, बुलिंग (घर और बाहर), पढ़ाई में नौकरियों में सब जगह उन्हें हाशिए पर रखा जाता है। नौकरियों में भेदभाव अगर नौकरी है भी तो वहां भी बदसुलूकी और उन्हें उनके मौलिक अधिकार भी देने में कतराता है समाज। इन्हीं सबसे ये लोगों का आत्मविश्वास गिर जाता है और सही वक्त पर सही काउंसिलिंग न मिलने, अपनों की मदद न होने से ये लोग आत्महत्या के तरफ बढ़ने लगते हैं। इसी बात के मद्देनजर LGBTQIA+ समुदायों के लिए दि व्हाइट स्वान फांउडेशन ने 24 जुलाई, 2019 को Mental Health 101: LGBTQIA+ Edition नाम से एक ई-किताब जारी की जिसमें पूरे देश में इस समुदाय के लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालने वाले कारणों की चर्चा की गई है। ई-किताब में हर समुदाय के अलग-अलग लोगों के साथ भेदभाव की अलग-अलग वजहें बताई गई है जैसे- धर्म, जाति, भुगोलिक, वर्ग (क्लास) वगैरह। 14 मार्च, 2021 के एक नेशनल डेली अखबार में ‘Moving Boundaries, Unpacking Boxes’ नाम से छपे एक लेख में भी यह खुलासा किया गया है किस तरह LGBTQIA+Muslim समाज में दोहरे भेदभाव का शिकार होते हैं जिसका जबर्दस्त असर उनके मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है।

यह बात सच है कि इन समुदायों के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर न तो बहुत शोध है और न कोई अध्ययन। मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य की इनकी जरूरतों को जानना और उनके हल तलाशना आज बेहद जरूरी है क्योंकि समाज भले ही इन्हें अपने में न गिने लेकिन, ये समाज का हिस्सा हैं और इन्हें इसी समाज में रहना है। समाज का एक नाखुश और तनावों में जीने वाले हिस्से को छोड़ देने से बाकी का हिस्सा भी कभी  खुशहाल नही रह सकता। इनके बेहतर मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी है अपनापन…परिवार में, समाज में, नौकरी में और स्वास्थ्य सुविधाओं का फायदा उठाने में। इन सभी को इस समुदाय के लिए संवेदनशील होना ही होगा तभी खुशनुमा समाज की तस्वीर मुक्कमल हो पाएगी।  

 

©नरजिस हुसैन, नई दिल्ली

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