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उपशास्त्रीय संगीत की संरक्षिका : कोठे की गायिकायें …

बीसवी सदी के पूर्वार्द्ध ने भारतीय उपशास्त्रीय संगीत का एक स्वर्णकाल देखा था। ठुमरी, दादरा, पूरबी, चैती कजरी जैसी गायन शैलियों के विकास में उस दौर की तवायफ़ों के कोठों का सबसे बड़ा योगदान था। तब वे कोठे देह व्यापार के नहीं, संगीत के केंद्र हुआ करते थे। उन्नीसवी शताब्दी से लेकर बीसवीं शताब्दी के लगभग मध्य तक देश के विभिन्न भागों में अनेक वेश्याएं ठुमरी गायन एवम् नृत्याभिनय के लिए प्रसिद्ध हुई। तवायफ, कोठा और मुजरा लफ्ज जो लोग हिकारत के साथ ही बोलते हैं उन्हें यह अंदाज ही नहीं कि इन्ही गायिकाओं ने 400 साल तक ठुमरी और कथक सरीखी परंपराएं जिंदा रखी हैं।

स्त्रियों के जिस वर्ग ने इस गायकी को अपनाया उन्हें गणिका, वेश्या, नर्तकी, बाई इत्यादि नामों से संबोधित किया गया। इसे “तवायफ़ों का गाना” कहते हुए इससे जुड़ी स्त्रियों को हेय दृष्टि से ही देखा गया लेकिन 19 वीं सदी से बीसवीं सदी के मध्य ठुमरी – दादरा को लोकप्रिय बनाने में तत्कालीन गायिकाओं – गवनहारियों का अहम योगदान रहा है। हुस्नाबाई, विद्याधर बाई, गौहर जान, रसूलन बाई, बड़ी मोतीबाई, जद्दनबाई, अख्तरी बाई ओर सिद्धेश्वरी बाई सरीखी गायिकाओं को विस्मृत नहीं किया जा सकता है। मुख्यतः नृत्य विधा से जुड़ी यह विधा वर्तमान में गेय विधा के रूप में प्रतिष्ठित है जिसका श्रेय इन्हीं गायिकाओं को है।

अंग्रेजों के विरुद्ध 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम विफल हो गया था और एक-एक कर देशी रियासतें ब्रिटिश शासन के कब्जे में आते जा रहे थे। कलाकारों से राजाश्रय छिनता जा रहा था। भारतीय कलाविधाओं को अंग्रेजों ने हमेशा उपेक्षित किया। ऐसे कठिन समय में तवायफों ने, भारतीय संगीत; विशेष रूप से ठुमरी शैली को जीवित रखने में अमूल्य योगदान किया।

मध्यकाल में ठुमरी तवायफ़ों के कोठों सहित रईसों और जमींदारों की छोटी-छोटी महफ़िलों में फलती-फूलती रही।

मुजरों का दौर काफी समय तक वेश्याओं की संगीतमय परंपरा को अपने में समेटे, अस्तित्व में बना रहा।

बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक वर्षों में रईसों और जमींदारों की कोठियों में संगीत की महफ़िलें सजती थी। ऐसी महफ़िलों में बड़े दरबारी संगीतकार और तवायफों की सहभागिता रहती थी। संगीत देवालयों से राज-दरबार और फिर वहाँ से निकल कर धनिकों की महफ़िलों तक पहुँच गया था। ठुमरी ने ऐसी महफ़िलों के जरिए ना केवल अपने अस्तित्व को बचाए रखा बल्कि इस शैली में नित नये प्रयोग भी जारी थे। नवाब वाजिद अली शाह के समय में ठुमरी का विकास नृत्य के पूरक के रूप में हुआ था। आगे चल कर इसका विकास स्वतंत्र गायन के रूप में हुआ। ठुमरी के इस स्वरूप को “बन्दिश” अथवा “बोल-बाँट” की ठुमरी का नाम दिया गया। सच कहा जाए तो ऐसी ही छोटी-छोटी महफ़िलों के कारण ही तमाम प्रतिबन्धों के बावजूद भारतीय संगीत की अस्तित्व-रक्षा हो सकी।

आजादी के बाद कोठों की प्रासंगिकता लगभग समाप्त हो चली थी और बदलते दौर में वेश्याओं का संबंध देह-व्यापार से जुड़ी महिलाओं के लिए रूढ. हो गया है।

बड़ी मोती बाई, रसूलन बाई, विद्याधरी बाई, काशी बाई, हुस्ना बाई, जानकी बाई, सिद्धेश्वरी देवी, अख्तरी बाई, जद्दन बाई, राजेश्वरी बाई, टामी बाई, कमलेश्वरी बाई, चंपा बाई, गौहर जान, मलका जान, केसर बाई केरकर, सितारा देवी और गिरजा देवी तक की पूरी ठुमरी गायकी की परंपरा को सुरक्षित -संरक्षित रखने वाली इन डेरेवालियों, कोठेवालियों के निजी जीवन के नजाने कितने ही तहख़ाने अनखुले रह गये। कितनी ही सुरीली आवाज़ों वाली बाई जी के नाम गुमनामी में ही दफ़न हो गये लेकिन इन ठुमरी गायिकाओं ने अपने संघर्ष को समयानुकूल रूपांतरित करने एवं उसे धार देने में कोई कमी नहीं छोड़ी।

जीवन की तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद इन गायिकाओं ने अपनी कला साधना में कोई कमी नहीं रखी। इनमें से कई गायिकायें 10 से 20 भाषाओं में गाती थीं। अपनी नज़्में ख़ुद लिखती एवं उनकी धुन बनाती। तकनीकी बदलाव के अनुरूप अपने आप को तैयार किया। गौहर जान और जानकी बाई ने ग्रामोंफोन की रिकार्डिंग में अपना परचम लहराया। गौहर जान ने बीस से अधिक भाषाओं में 600 से अधिक रिकार्डिंग किये। इसी रिकार्डिंग की बदौलत गौहर देश ही नहीं विदेश में भी मशहूर हुई। जद्दन बाई ने सिनेमा संगीत में महत्वपूर्ण योगदान दिया। अपनी बेटी नरगिस को उन्होने कामयाब अभिनेत्री बनाया। ग्रामोंफोन, संगीत कंपनी, रंगमंच और सिनेमा में इन गायिकाओं ने अतुलनीय योगदान दिया।

आज का साहित्य अनेक विमर्शों का केंद्र है। किंतु इन -“गायिकाओं – गवनहारियों के जीवन – संघर्ष का वर्णन, जिनके सर और संगीत का आलोक तो हमारे सामने है लेकिन स्त्री होने के कारण और अपने समय – समाज की कथित कुलीनता के दायरे से बाहर होने के कारण जिन अवरोधों का पग – पग पर उन्हें सामना करना पड़ा उस अंधेरे का कहीं कोई जिक्र नहीं करता। गौहर जान से लेकर बेगम अख्तर तक और मोघूबाई से लेकर गंगूबाई बाई हंगल तक — कलाकारों की एक लंबी फेहरिस्त यहां हम देख सकते हैं, जिन्हें अकल्पनीय प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच संगीत – साधना करनी पड़ी। “(मृणाल पाण्डे – ध्वनियों के आलोक में स्त्री)

 बावजूद इसके संगीत के क्षेत्र में वेश्याओं की भूमिका ओर उनके योगदान को नकारा नहीं जा सकता। ठुमरी, कजरी, दादरा आदि गायन शैली और कथक व अन्य लोक शैली के नृत्यों के प्रचलन में वेश्याओं ने अपनी तरह से योगदान दिया है। कहा जा सकता है कि उनके योगदान की प्रकृति और बुनावट पर अभी समीचीन शोध का कार्य शेष है।

 

©डॉ. विभा सिंह, दिल्ली                                                    

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