
इकोनॉमी
सांसें …
नज़्म
आती-जाती रहती हैं यादें तुम्हारी सांसों की तरह। रोशन रखते हैं जहां अपना तुम्हारी यादों के चिरागों से।
जब आती है याद तुम्हारी, दिल में उतर आती है सूरत तुम्हारी, कुरेद जाती है ग़म सारे।
तेरी याद में बहते हैं जब अश्क हमारे तो लग जाती है झड़ी रिम-झिम सी बारिश की तरह। समेटती रहती हूं आंचल में यादों को तुम्हारी, लगता है डर कहीं कोई याद छूट ना जाए, कहीं उसे लग ना जाए नज़र ज़माने की।
अब तो आ जाओ एहबाब मेरे, बढ़ रही है दिले-बेताबी हमारी। तकती रहती हूं, राह काश ! कोई मिले क़ासिद ऐसा जो ले जाए पैग़ाम हमारा, तुम्हें दिलाए ऐतबारे-इश्क हमारा। करते हैं उम्मीदे-वस्ल, ना जाने ख़ुदा कब तुम्हें लिख दे तहरीर में हमारी …
©प्रेम बजाज, यमुनानगर
















