लेखक की कलम से

सुनो न ….

तुम वो हो जिसे कभी
सोच में भी शायद
सोचने से डरती थी
अब जब पा ली हूँ
तो समझ नहीं पा रही
कहाँ बैठाऊँ तुम्हें
कैसे निहारे तुम्हें
कहाँ समाऊँ तुम्हें
कहाँ तक साथ निभाऊँ
तुम संग
जीवन में क्या पाया
और क्या-क्या खोया
नहीं हिसाब उसका
पर तुम्हें पाने से
ज्यादा खोने का एहसास
भर रुलाता है मुझे
रिश्ते तो बहुत मिले
नामी, बेनामी
सब बेवफा तो नहीं थे
पर वफा करते-करते
मानो मैं थक सी
गयी हूँ
जी करता है तुम
संग ही बस जी लू
रंग जीवन के मिल
तुम संग पी लू
खैर अब छोड़ो
रंग,संग की बातें
दौड़ रही हूँ
बाह थामे तुम्हारा
अए मेरे हमसफर
बीच राह में
मझधार में
लहरों के प्रवाह में
बस हाथ थामे
मजबूती से खड़े
रहना हर पल
देखो ,सोचो न
अरे अरे!
मैंने तुमसे ज्यादा
तो नहीं माँग लिया
सुनो न माँगना,बोलना
कुछ अच्छा नहीं लगता
प्रेम में तो सब कहते हैं
आँखें बयां करती हैं
मुहब्बत की जुबा को
देखो न तुम भी
ज़रा पढ़ लेना
वो सब कुछ
जो मैं तुम्हें
कहना तो चाहती हूँ
पर आँखों की भाषा से….
 

 

©अल्पना सिंह, शिक्षिका, कोलकाता                            

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