लेखक की कलम से

शिक्षक दिवस पर मेरी भावाभिव्यक्ति …..

 

सह्रदय नमन आज मैं करती

आभार गुरुओं का मन में धरती

ज़िन्होने सजाया, संवारा मन से

मेरे जीवन का कल और आज़

 

वर्तमान परिस्थितियों में शिक्षक बनने की बात हो तो युवाओं की पसंद में यह बहुत नीचे चला जाता है। आर्थिक दृष्टि से भी इसके आकर्षक नहीं होने से इसके प्रति युवाओं का मोहभंग हुआ है। कई बार शिक्षकों के प्रति आचरण भी एक मुख्य मुद्दा रहा है।आज वह सम्मान अध्यापक का समाज मे नही रह गया हैं।विद्द्यालय भी शिक्षक को वह सम्मान नही दे रहे है जिसके वे हकदार होते हैं ।शिक्षा व्यवस्था व नियम कानून भी इसके कुछ हद तक जिम्मेदार हैं।युवा पीढ़ी तो वही सीख रही है जो उनको परोसा जा रहा है।शिक्षकों को मिलने वाली सुविधाओं में कमी की वजह से भी शिक्षक समाज में अपनी बदलती भूमिका को स्वीकार करने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं हो पा रहे हैं। इसका सीधा असर शिक्षा व्यवस्था पर पड़ रहा है।

अध्यापक बदलाव के विरोधी नहीं हैं, वह नए विचारों और नवाचारों के खिलाफ नहीं है. वह सफलता की तमाम कहानियां लिखना चाहता है. बदलाव और समय के घूमते पहियों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना चाहता है. लेकिन आसपास के माहौल की निराशा का दीमक उसके रचनात्मक मन के कोने को धीरे-धीरे चाट रहा है. इससे उसे बाहर निकलने के लिए प्रोत्साहन की जरूरत है. आज स्कूलों में कार्यभार इतना ज्यादा बढ़ गया है कि अध्यापकों पर उसका मानसिक भार बढ़ रहा है बदले में महंगाई के इस दौर ने वेतन के नाम पर उनका शोषण किया जाता हैं।स्कूल आज केवल ओर केवल व्यवसाय का अड्डा मात्र बन कर रह गए हैं।

प्रेरक संबोधन लुप्त प्राय हो गया है। इसके अभाव में विद्यार्थियों के चरित्र निर्माण, शारीरिक विकास पर बुरा असर पड़ा है।आज की शिक्षा सिर्फ और सिर्फ केवल मात्र कॅरियर बनाने तक सीमित रह गई है। हर मां-बाप भी यही चाहता है कि बच्चे का कॅरियर बने ।विद्द्यालय प्रशासन भी आज केवल रिजल्ट अच्छा रहे यही चाहता है ।यही कारण हैं आज का युवा सही आचरण से दूर होता जा रहा है।

इसलिए आज के शिक्षकों व शिक्षा की नीतियां बनाने वालों को इस पर गहराई से मंथन करना होगा। स्कूलों में पढ़ाई के साथ-साथ चरित्र निर्माण, नैतिक शिक्षा की पढ़ाई जरूर हो।

“हे भगवन, दे मुझमें इतनी शक्ति दे

बनी रहे मुझमें शिक्षा की भक्ति

एक आदर्श शिक्षक विरल बनी रहूँ

ज्ञान, चरित्र, सम्पूर्णता से भरी रहूँ।”

 

 

©डॉ मंजु सैनी, गाज़ियाबाद                                             

 

 

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