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स्वावलंबन शब्दसार की गोष्ठी में पढ़ी गईं ‘पिता’ पर भावुक रचनाएँ …

 “पिता जीवित हों या न हों, वे सदैव हमारे दिल में धड़कते हैं तथा हमारे व्यवहार और संस्कार में उनकी उपस्थिति झलकती है” यह कहना है सुप्रसिद्ध कवयित्री और लेखिका श्रीमती ममता किरण का, जो स्वावलंबन ट्रस्ट की साहित्यिक इकाई स्वावलंबन शब्दसार की राष्ट्रीय गोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित थीं। ‘पिता’ विषय पर आयोजित इस गोष्ठी की अध्यक्षता आकाशवाणी के पूर्व निदेशक एवं पदमश्री से अलंकृत अनगिनत राष्ट्रीय एवम् अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त साहित्यकार लक्ष्मी शंकर वाजपेयी ने की तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में मनमोहन गुप्ता, जो फ़रीदाबाद पैट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन के महासचिव होने के साथ ही राष्ट्रीय कवि संगम के हरियाणा प्रभारी भी हैं, ने शिरकत की।

स्वावलंबन शब्द सार की यह गोष्ठी शनिवार ३ अप्रैल को ऑनलाइन पटल पर आयोजित हुई। कार्यक्रम का शुभारंभ संस्था की राष्ट्रीय संयोजिका श्रीमती परिणीता सिन्हा द्वारा दीप प्रज्ज्वलन एवम् माँ शारदे का माल्यार्पण के साथ हुआ। स्वावलंबन शब्द सार के दिल्ली प्रांत की संयोजिका श्रीमती रचना निर्मल ने मधुर कंठ से माँ शारदे की वंदना का गायन किया। कार्यक्रम में स्वावलंबन ट्रस्ट की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती मेघना श्रीवास्तव तथा महामंत्री राघवेंद्र मिश्रा की गरिमामय उपस्थिति रही। साहित्य अकादमी से पुरस्कृत श्रीमती शकुंतला मित्तल की उपस्थिति ने मंच का मान बढ़ाया।

राष्ट्रीय संयोजिका परिणीता सिन्हा और राष्ट्रीय सह संयोजिका भावना सक्सेना ने मिलकर कार्यक्रम का सुचारू मंच संचालन किया। सभी गणमान्य अतिथियों के यथोचित स्वागत के उपरांत काव्य पाठ आरंभ हुए। काव्यगोष्ठी का विषय ‘पिता’ था अतः सभी की रचनाएँ भावविभोर कर रही थी। कुछ रचनाएं इतनी मार्मिक थी कि लोग भावुक हो उठे।

कार्यक्रम अध्यक्ष लक्ष्मी शंकर वाजपेयी ने विषय के चयन तथा सभी रचनाओं की सराहने करते हुए कहा कि माँ पर तो अनगिनत कविताएँ लिखी जाती हैं लेकिन पिता पर एक साथ इतनी रचनाओं का श्रवण मन को भावुक करने वाला है। उनकी पंक्ति ‘बोले पिता कि फ़ीस की मत सोचना कभी…..’ सुनाते हुए वे स्वयं भावुक हो गए। मुख्य अतिथि ममता किरण ने अपनी सुमधुर आवाज़ में पिता पर लिखी कविताएँ सुनाकर सबको भावविभोर कर दिया। उनकी पंक्ति ‘छत होती तो देखती अपने हिस्से का आसमान’ सुनकर सभी संवेदित हो गए। विशिष्ट अतिथि मनमोहन गुप्ता ने भी कार्यक्रम की सराहना की। कार्यक्रम के अंत में राष्ट्रीय संयोजिका श्रीमती परिणीता सिन्हा नें सभी का धन्यवाद ज्ञापन किया।

कलमकारों की मनमोहक रचनाओं की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं –

 १. पिता का साया आज फिर यादों में लहराया, स्नेह आपका छतनार वृक्ष की ज्यों हो घनेरी

 छाया- शकुंतला मित्तल, गुरुग्राम (हरियाणा)

 २. पापा की परी हूँ मैं हाँ पापा की परी हूँ मैं –

 ऋचा सिन्हा, मुम्बई (महाराष्ट्र)

 ३. तपती धरती जब पाँव जलें,अम्बर की छतरी

 से पापा- अभिलाषा विनय, नोएडा (उ प्र)

 ४. मैं हूँ न कहकर गले लगाते थे- सुनीता चड्ढा,

 दिल्ली

 ५. चुग्गा पानी सुबह शाम का माँ की झोली में,

 पिता अदृश्य से छाया देते अक्षय पात्र हुए-

 भावना सक्सैना, फ़रीदाबाद (हरियाणा)

 ६. तुम्हारी पीठ की सवारी से शुरु हुआ सफ़र

 मेरा- श्रुतकीर्ति अग्रवाल, पटना (बिहार)

 ७. परमपिता परमेश्वर का साकार स्वरूप है

 पिता- निवेदिता सिन्हा, भागलपुर (बिहार)

 ८. इक पल में सब प्यार भुलाया, पापा क्यों

 कर दिया पराया-स्वीटी सिंघल, बेंगलुरु

 (कर्नाटक)

 ९. जो चले गए हैं तारे बन देखो नभ को

 चमकाएँ- मोना सहाय, नोएडा (उ प्र)

 १०. ‘शब्दों से परे’ लघुकथा। पिता ने बहुत

 कुछ सिखाया जो शब्दों से परे है-सीमा सिंह,

 ग़ाज़ियाबाद (उ प्र)

 ११. मेरे पिता जबान के थे पक्के, वादे करते थे

 सच्चे-रचना निर्मल, दिल्ली

 १२. पिता घर की दीवारों पर एक छत है जो

 सख्त होकर मौसम का बदलना भी झेल जाते

 है- परिणीता सिन्हा, गुरुग्राम (हरियाणा)

 १३. मुझको घर आने दो बाबा, इक जीवन मैं

 भी पाऊँगी- रीना सिन्हा, जमशेदपुर

 (झारखंड)

 १४. कहा जाता है माँ भगवान का रूप होती

 है,पर पिता तो साक्षात भगवान होते हैं- चंचल

 हरेंद्र वशिष्ट, दिल्ली

 १५. मानस के अंतः धर्म का विस्तार होते हैं

 पिता- लता सिन्हा ज्योतिर्मय, मुजफ्फरपुर

 (बिहार)

 १६. उनकी मुस्कान जैसे सब रिश्तों की तुरपाई

 है-चंचल ढींगरा, गुरुग्राम (हरियाणा)

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