
इकोनॉमी
पहला चुंबन …
एक दिन मैं अपनी कविताओं में
सब कुछ उल्टा-पुल्टा लिखूंगी..!
नदियां नहीं जाएंगी
सागर में समाहित होने..।
सागर स्वयं, आएगा
नदी के उद्गम तक
उसको लिवाने..।
आखिर, मिठास की चाह
उसे भी तो है ..!!
धरा को,
आकाश के ऊपर लिखूंगी..।
आकाश तब, उचककर करेगा..
गगनचुंबी पर्वतों की चोटियों को
चूमने का प्रयास..।
वृक्षों पर डालकर झूला
पांव से, बादलों को छुऊंगी।
ये वो दिन होगा..
जब मैं अपना, पहला चुंबन करूंगी..!
उस क्षण…..
मैं अपनी पलकें नहीं मुंदने दूंगी
न ही थमने दूंगी, अपनी सांसें।
मैं हो जाऊंगी, थोड़ी निर्लज्ज..।
क्योंकि..तुम्हें स्वीकारने की प्रक्रिया में
मेरा ये पहला..पड़ाव होगा।
जिसका मैं.. जश्न मनाऊंगी।।
©सुनीता डी प्रसाद, नई दिल्ली














