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अनकही कहानी …

न जाने क्यों कुछ कहानियां अनकही रह जाती है
जहन में तो होता है पर बाहर नहीं आती है
अंधेरे में किरदार कहीं गुम हो जाते हैं
सोच कर भी हम कितना घबराते हैं
जिंदगी एक पहेली है
रोज यहां कुछ घट जाता है
बेगाने अपने हो जाते हैं
और अपने बेगाने बन जाते हैं
रोशनी की किरण कहीं दूर नज़र तो आती है
पर न जाने क्यों हमारे पास नहीं आती है
डर लगता है दुनिया के लोगों से
कहीं बुझी – सी रह न जाए अरमान हमारे
कहीं बन न जाऊं मैं उस अनकही कहानी का किरदार
सोच मेरी नकारात्मक न बन जाए
यहां हर एक किरदार के पीछे एक मुखौटा छिपा है
हर मुखौटा के पीछे एक दर्द
अनकही सी कहानी , अव्यक्त भावना
जीवन को दिशा ही न दिखाए
हां, कुछ कहानी अनकही न रह जाए ।

 

©डॉ. जानकी झा, कटक, ओडिशा

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