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आज ब्याज भी चुका दिया …

लघुकथा

उत्तराखंड का एक छोटा सा गांव है सीतामढ़ी। आज 3 दिन हुए बारिश लगातार हो रही थी, हर चीज जलमग्न हो रही थी, आज तीसरे दिन बारिश का प्रकोप कुछ ज्यादा ही था, सभी अपने अपने घर में छुपे बैठे हैं कि तभी खबर आती है गांव के साहूकार लाला विष्णु दत्त नहीं रहे। थोड़ी ही देर में यह खबर गांव में जंगल की आग की तरह फैल जाती है। सब एकदम हक्का-बक्का हैं कि अचानक लालाजी को क्या हुआ, कल तक तो अच्छे भले थे।

जब यह खबर एक लकड़ी का टाल चलाने वाले रामकुमार को चलती है तो वो मन ना होते हुए भी हाथ में छाता ले लाला विष्णु दत्त के अंतिम दर्शन को निकल पड़ता है और सोचता जा रहा था उस दिन को जब उसने गरीबी के चलते और अपनी बेटी की शादी के लिए लाला विष्णु से 50,000 रूपए का कर्ज लिया था।

बेटी तो विदा हो गई, लेकिन कर्ज का ब्याज सुरसा के मुंह की भांति बढ़ता ही जा रहा था, उस पर भी दिन-रात लालाजी का तगादा रहता, वे यह ना समझते कि उसकी भी कुछ मजबूरी होगी। लालाजी को रूपए पैसे की कोई कमी न थी, पर ब्याज का खून मुंह लग चुका था। ऐसे में बेचारा गरीब रामकुमार करे तो क्या करें।

एक दिन तंग आकर उसने अपना घर बेचकर लालाजी के 50,000 रूपए चुका दिए और अपनी पत्नी सहित अपने उसी लकड़ी की टाल में आकर बस गया। ईश्वर की कृपा से दोनों की गुजर-बसर लायक कमा ही लेता और दोनों पति-पत्नी प्रभु के भजन गाकर सुख में जीवन काटते।

इन्हीं यादों के झुरमुट में चलते चलते लालाजी का घर कब आ गया पता ही ना चला। घर से रोने पीटने की आवाजें आ रही थी हर कोई लालाजी के इस तरह अचानक जाने से हक्का-बक्का था। लाखों की जायदाद रुपया पैसा था, लेकिन अंतिम समय कुछ काम न आ सका, डॉक्टर भी न बुला पाए, सब कुछ यहीं धरा रह गया।

राम कुमार ने भी लालाजी के अंतिम दर्शन किए और वहीं एक तरफ बैठ गया। तभी वहां किसी ने बताया कि लगातार बारिश होने की वजह से कहीं भी चिता के लिए सूखी लकड़ी का इंतजाम नहीं हो पा रहा है, तभी लालाजी के मुनीम ने रामकुमार की ओर देखा और पूछा क्यों रे रामकुमार क्या तेरे पास लकड़ी का इंतजाम हो पाएगा।

रामकुमार ने हां कर दी और तुरंत लकड़ी का इंतजाम कर दिया। जब मुनीमजी ने उसे पैसे देने चाहे तो रामकुमार ने पैसे लेने से साफ इनकार कर दिया और मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद कहा और सोचा कि चलो आज ईश्वर ने लालाजी के ब्याज के भी ब्याज से मुझे मुक्ति दिला दी और मैंने ब्याज का भी ब्याज चुका दिया।

 

©ऋतु गुप्ता, खुर्जा, बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश

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