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नर्मदा परिक्रमा का मध्य भाग नेमावर जहां विराजमान हैं सिध्देश्वर महादेव …

नर्मदा परिक्रमा भाग- 22

 

अक्षय नामदेव। नर्मदा परिक्रमा के दौरान परिक्रमा वासियों के साथ साधारण तौर पर कोई असहयोग या बुरा व्यवहार नहीं करता परंतु होलिका दहन का दिन होने के कारण हम चाहते थे कि उचित स्थान देखकर हम रात्रि विश्राम के लिए रुक जाएं। शाम लगभग 5:30 बजे हम नर्मदा तट के ‌नेमावर पहुंच गए थे। नेमावर के महात्म्य के बारे में हमने पहले ही बहुत कुछ सुन रखा था इसलिए हमें नेमावर रात्रि विश्राम के लिए उचित स्थान लगा। यहां हम ब्रम्हचारी के चिन्मय आश्रम में आश्रय लिए। ब्रम्हचारी अत्यंत सरल, सादगी पसंद ज्यादातर मौन रहने वाले साधु है। मैं और तिवारी जब उनसे मिलने गए तो उन्होंने अत्यंत कम शब्दों में ही हमें अपने आश्रम में ठहरने की स्वीकृति प्रदान की। ब्रह्मचारी का चिन्मय आश्रम बिल्कुल नर्मदा तट पर पहाड़ी जैसे ऊंचे स्थान पर है। आश्रम के जिस बरामदे में हम रुके हैं वहां से मां नर्मदा बिल्कुल समक्ष दिखाई देती हैं। हमें यह स्थान काफी पसंद आया। जहां हमने अपनी चटाई बिछाई थी उस बरामदे में और भी परिक्रमा वासी थे। हम वहां पहुंचते ही सबसे नर्मदे हर कह कर अभिवादन किया। उन्होंने भी नर्मदे हर के जयघोष किया।

नेमावर नर्मदा के तट पर अत्यधिक महत्वपूर्ण तीर्थ है। नेमावर को नर्मदा उद्गम अमरकंटक और रेवा सागर संगम के मध्य का क्षेत्र माना जाता है यही कारण है कि नेमावर को मां नर्मदा का नाभि क्षेत्र कहा जाता है। देवास जिले के खातेगांव तहसील में स्थित नेमावर नर्मदा के मध्य स्थान में है। नर्मदा नदी के बीच में यहां एक कुंड है जिसे सूर्य कुंड कहा जाता है यही कुंड नर्मदा का नाभि स्थान माना जाता है। यहां नर्मदा तट पर सिद्धेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर है। मंदिर का प्रवेश द्वार एवं प्रांगण तथा मंदिर का शिल्प कौशल अपने आप में अद्भुत है। यहां नर्मदा तट पर नर्मदा का एक मंदिर भी है जिसमें मां नर्मदा की अत्यंत सुंदर प्रतिमा स्थापित है संवत 1985 में स्वामी रामानंद ने इस नर्मदा मंदिर की स्थापना की थी।

ब्रम्हचारी के आश्रम में अपना सामान इत्यादि रखकर हम नर्मदा तट में स्नान करने गए। तिवारी कुछ ज्यादा थक गए थे इसलिए उन्होंने आश्रम में ही रह कर आराम का निर्णय लिया जबकि मैं निरुपमा एवं मैंकला नर्मदा तट चले गए। ब्रह्मचारी के आश्रम से नर्मदा तट अत्यंत ढलान पर है। मैं पूरी नर्मदा परिक्रमा के दौरान अपनी छड़ी साथ में रखा था जिसके कारण मुझे पहाड़ी उतरने में ज्यादा परेशानी नहीं हुई। पहाड़ी उतरकर हम नर्मदा के घाट पर थे। काफी बड़े हिस्से पर विशाल नर्मदा का घाट बना हुआ था जिसके ऊपर ही सिद्धेश्वर महादेव का मंदिर स्थित है। हमने जल्दी से स्नान किया तथा मां नर्मदा की पूजन आरती तट पर कर के दीपदान किया। यहां नर्मदा में पानी ज्यादा है इसलिए स्नान वाली जगह में बैरिकेटिंग कर दी गई है।संध्या होने के बावजूद भी लोग बड़ी संख्या में नौका विहार कर रहे थे। दीपदान करने के बाद हम ऊपर सिद्धेश्वर महादेव आ गए और वहां दर्शन पूजन सिया। अंधेरा होने के कारण हम वहां ज्यादा देर नहीं रुक सके तथा सुबह आएंगे ऐसा संकल्प लेकर हम वापस ब्रह्मचारी के आश्रम चले गए।

ब्रह्मचारी के आश्रम में आरती पूजन का समय हो चुका था। हमारे सहित आश्रम में रुके सभी परिक्रमा वासियों एवं श्रद्धालुओं ने वहां संध्या आरती पूजन में भाग लिया। आश्रम ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। वहां खिड़की में खड़े होकर मां नर्मदा का दर्शन करना बड़ा सुखदाई लग रहा था। नर्मदा नदी पर पूर्णिमा के चांद का प्रतिबिंब माता की खूबसूरती बढ़ा रहा था। यह दृश्य आज भी मेरी नजरों में झूल रहा है पर इसका वर्णन कर पाना कठिन है।

आश्रम में भोजन की घंटी लगने के बाद हमें आश्रम के कार्यकर्ता ने भोजन के लिए आमंत्रित किया। पास ही लेटे एक परिक्रमा वासी साधु को मैंने कहा चलिए भोजन के लिए बुलाया जा रहा है तो वह कहने लगे मैं भोजन नहीं करता हूं। वह कहने लगे हैं वह सिर्फ जल ही ग्रहण करते हैं। मैं क्या कहता।साधुओं की तपस्या के बारे में क्या कहा जाए?

हम भोजन कक्ष में गए वहां ब्रह्मचारी अपने हाथ से सभी को भोजन परस रहे थे। भोजन प्रसाद के बाद हम विश्राम में चले गए।

सुबह जल्दी उठकर हमने आश्रम परिसर में लगे नल में ही स्नान किया और सिद्धेश्वर महादेव मंदिर चले गए। बीती शाम को हमने भोलेनाथ से वादा किया था कि सुबह आएंगे सो पहुंच गए। इसके पूर्व हम नर्मदा तट भी गए तथा वहां नर्मदा तट का पूजन दर्शन कर आरती की तथा वापस सिद्धेश्वर महादेव पहुंच गए। रंगोत्सव पर्व होली होने के कारण सिद्धेश्वर महादेव को वहां के पुजारियों ने सुंदर रंग बिरंगी पंखुड़ियों से सजाया था। मंदिर में अन्य दिनों की अपेक्षा श्रद्धालुओं की संख्या कम थी। हमने मंदिर के गर्भ गृह में बैठकर आराम से भगवान सिद्धेश्वर महादेव का अभिषेक किया पूजन आरती की। सिद्धेश्वर महादेव के पुजारी ने हमारा परिचय आदि पूछा। पुजारी अत्यंत शांत सरल एवं संतोषी स्वभाव के जान पड़े। हम सिद्धेश्वर महादेव मंदिर परिसर में काफी देर तक रहे और वहां से नर्मदा का दर्शन करते रहे। मन ही नहीं भरता।

सुबह के 9:30 बजे हम वापस ब्रह्मचारी के चिन्मय आश्रम आ गए। वहां हमें बाल भोग प्रसाद के रूप में उपमा ( नमकीन हलवा सूजी का) मिला जो बहुत ही स्वादिष्ट था। बाल भोग के बाद हमें चाय पीने को दी गई। कुछ देर बाद हम बाल ब्रह्मचारी से मिलने उनके कक्ष गए और उन्हें दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। ब्रह्मचारी ने हमें का होली का दिन है आज यहीं रुक जाइए,कहा। हमने आगे परिक्रमा में जाने की इच्छा जताई तो उन्होंने मुस्कुरा कर मौन रहते हुए हमें विदाई दी। 29 मार्च 2021 सोमवार रंगोत्सव के दिन सुबह 11:00 बजे हम अपना सामान समेट कर आगे की परिक्रमा के लिए रवाना हो गए।

हर हर नर्मदे।

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