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बदलते दौर से अच्छा :बदलते मौसम

हमारे दैनिक जीवन में हो रहे बदलाव सिर्फ हमारे जीवन ही नही बदलते है ,साथ ही पूरा परिदृश्य बदल जाता है सभ्यता, संस्कृति, मनोरंज ,कला एवं अन्य । इस अंधी दौड़ में हम खुद को नही देख पाते हैं कि हम कहा खड़े हैं ,क्या मेरा प्रतिमान है । एक सभ्य समाजी होने के साथ हमारी संस्कृति ,सभ्यता ,मनोरंजनीय साधन में पूरी तरह से एक मौसम के अनुरूप विकसित होना प्रतीत होता है। हमें सभ्य बनाने के लिए पूरी तरह से पूँजी, टेक्नॉलॉजी ,संचार और लोकप्रियता के साथ कला के संबंधों को जांचना -निरखना हमारे समय के सांस्कृतिक विमर्श का प्रमुख मुद्दा है ।मॉस मीडिया और टेक्नॉलॉजी के विकास ने 20 वीं सदी में “लोकप्रिय संस्कृति”की अवधारणा को जन्म दिया था , औद्योगिक समाजों में पनपी यह लोकप्रिय संस्कृति पिछले सौ वर्षों के दौरान अपनी परिभाषा ,अपनी बुनावट ,और अपने लक्ष्यों में अधिक से अधिक बड़े जनसमूह को निशाना बनाती रही है । लेकिन हैरान परेशान होने की जरूरत नहीं है ,संस्कृति का ऐसा रुप जो मूलतः मनोरंजन प्रधान रहा है ,सरल शब्दों में कहे तो सीधा सपाट ,लाभ कमाऊ से ज्यादा कुछ नही है , साथ हमारी लोकप्रिय संस्कृति ( क्षेत्रीय जो गंभीर कला ,नाटक ,खेल ,गीत ) को अपदस्थ और गैर प्रासंगिक कर दिया है. आज जिस तरह से समाज में मनोरंज के साधन उपलब्ध है अंग -प्रदर्शन , नग्नता द्वारा कामोद्दीपन को दिखाना और खुद को एक संभ्य समाज के रूप पेश करना यूरोपीय सभ्यता का अनुसरण मात्र है ,न की एक भारतीय संस्कृति ,सभ्यता का प्रतिमान स्थापित करना । आज समाज में अर्द्धनग्न अवस्था वाली चलचित्र का असर ऐसा पड़ता हुआ दिखाई दे रहा है कि बच्चे ,जवान का मनोदशा रूपान्तरण हो गया है । ये बहुत ही घातक साबित होता दिखाई दे रहा है , आज समाज में जघन्य अपराधों का बढ़ना इसका भी एक कारण है ।साथ हमारी क्षेत्रीय भाषाओं के साथ ,क्षेत्रीय सभ्यता ,संस्कृति का विलोपन भी होता है । आज एक संभ्य समाज में संभ्य मनोरंज की आवश्यकता है ,हमारी आने वाली नश्ल को सभ्य समाज की जरूरत होगी ,हमें अपने लिए न सही आने वाली पीढ़ियों के बारे में सोचना चाहिए।
©अजय प्रताप तिवारी चंचल 

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