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भिखारी ठाकुर जिन्होंने लोक साहित्य में बजाया ढंका …

आज 103 वीं जयंती पर विशेष

 

नई दिल्ली (डॉ साकेत सहाय) । वर्ष 1887 में आज ही के दिन जन्मे लोक साहित्यकार भिखारी ठाकुर की आज 103वीं जन्म जयंती है। भोजपुरी हिंदी के महान साहित्यकार कवि, नाटककार, संगीतकार भिखारी ठाकुर ने अपनी पुश्तैनी कार्य नाई कर्म से जीवन-यात्रा की शुरुआत की। उन्होंने अपनी भावप्रवणता और संप्रेषनीयता से लोक साहित्य मे जो स्थान प्राप्त किया उसकी जगह कोई और नहीं ले सकता।

रोज़ी-रोटी की तलाश मे पलायन करने वालों के परिजनों की व्यथा-कथा का मर्मांतक चित्रण करती उनकी कालजयी नाट्य कृति “बिदेशिया” अमर गान है। भिखारी ठाकुर ने अपने प्रदर्शन कला का, जिसे लोकप्रिय शब्द में नाच कहा जाता है को अमर किया।

रोज़ी-रोटी के सिलसिले में वे बंगाल गए थे वे वहाँ की रामलीला देखकर काफ़ी प्रभावित हुए। तब उन्होंने गांव लौटकर लिखना-पढ़ना-सीखना शुरू किया, वे इस बात को प्रमाणित करते है कि व्यक्ति अपनी प्रतिभा के बल पर अमर हो सकता है, उसके लिए अंग्रेज़ी एकमात्र जरुरी नहीं। बिदेसिया, गबरघिचोर, बेटी वियोग समेत अलग-अलग फलक पर रची हुई उनकी दो दर्जन कृतियां हैं। उनकी रचनाएं राम, कृष्ण, शिव, रामलीला, हरिकीर्तन आदि को समर्पित है।

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