
इकोनॉमी
जाड़ा बहुत सतावत बा
सरसर हवा बाण की नाईं
थर थर काँपैं बाबू माई
तपनी तापैं लोग लुगाई
कोहिरा छंटत नहीं बा भाई
चहियै सबै जियावत बा
जाड़ा बहुत सतावत बा
गरमी असौं बराइस खीस
जाड़ा भय बा ओसे बीस
जौ ना रोकिहैं अब जगदीस
मरि जइहैं बुढ़ये दस बीस
जियरा बहुत जरावत बा
जाड़ा बहुत सतावत बा
माछी मच्छर भएन अलोप
पहिने बाटै सब कनटोप
बरफ किहे बा अइसन कोप
गाँव भयल सरवा यूरोप
केहु ना देखै आवत बा
जाड़ा बहुत सतावत बा
©केबी सिंह, दिल्ली
परिचय- हाईकोर्ट व सु्प्रीम कोर्ट में वकालत, चेंबर नं. 539, लायर्स चेम्बर ब्लॉक सेक्टर-10 द्वारिका, लीगल एडवाइजर, मुम्बई ग्लोबल न्यूल पेपर, इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस व अन्य।
















