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श्रमिकों के मोती थे वोराजी ….

पं.मोतीलाल वोरा श्रमिक (बस कर्मचारी से मुख्यमंत्री, केन्द्रीय मंत्री और राज्यपाल) रहे। श्रमजीवी पत्रकार (नवभारत, दैनिक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी) में कार्य किया। अत: मेहनतकशों के अभिन्न सुहृद भी थे। सबसे पुरानी और अत्यंत धनाढ्य पार्टी के 18 वर्षों तक कोषाध्यक्ष रहे। जरुरतमंदों के लिये सदैव मददगार थे। यही आदत अपने उत्तराधिकारी स्व. अहमद मोहम्मदभाई पटेल को उन्होंने दी। वोराजी को ”ना” कहना नहीं आता था। यूं भी हर राजनेता हमेशा ”हां” ही कहता है। मगर जब—जब मसला मजदूरों का होता तो प्राणपण से वे सेवा—सहायता में जुट जाते। उनकी इस क्रियाशीलता का प्रमाण उनके संसदीय कार्यों की रपट में मिलती है। सदन में वोराजी की दस्तावेजी उपस्थिति 95 प्रतिशत रही, जबकि औसत सांसद की केवल 79 प्रतिशत ही हाजिरी होती है। शतप्रतिशत हाजिरी वोराजी की थी 2018 के वर्षाकालीन अधिवेशन में। प्रश्न पूछने की राष्ट्रीय औसत 616 है। वोराजी के नाम वर्षपर्यंत 1261 प्रश्न रहे। दोगुने रहे। सांसदों द्वारा अधिकतम बार श्रम—संबंधी मुद्दे वोराजी ने ही उठाये। बाल श्रम पर पाबंदी (6 दिसंबर 2019), गन्ना किसानों को भुगतान (12 फरवरी 2019), कपड़ा मजदूरों पर जीएसटी का बोझ (20 जुलाई 2017), ईपीएफ (कर्मचारी भविष्यनिधि राशि) में बढ़ोतरी (1995), इत्यादि। वोराजी के नाम ही सभी पटल पर दर्ज हैं। मीडिया संबंधी मसले उठाने में भी वे अव्वल ही थे। फर्जी तथा प्रायोजित समाचार पर दण्डात्मक कार्रवाही की मांग (10 मई 2016 तथा 2 जुलाई 2019), टीवी समाचार पत्रों पर शासकीय दबाव (2 अगस्त 2008) की भर्त्सना, उदार विज्ञापन नीति (15 जुलाई 2016) अपनाना, बस्तर में संवाददाताओं पर पुलिसिया जुल्म (8 मार्च 2016) की जांच इत्यादि जनवादी मसले वे उठाते रहे। वनभूमि पर अवैध कब्जा, अन्तर्जातीय विवाह को प्रोत्सहित करना,(19 जुलाई 2019), छत्तीसगढ़ के आदिवासियों तथा समस्तीपुर (बिहार) की धनहीन महिलाओं का गर्भाशय निकालकर खूब फीस वसूलना आदि।

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वोराजी एक हिम्मती राज्यपाल थे। याद कर लें। वीवी गिरी को जवाहरलाल नेहरु ने उत्तर प्रदेश का राज्यपाल (10 जून 1957) नामित किया था, तब गिरी बोले थे : ” मैं यूपी मुख्यमंत्री का सुशुप्त हमबिस्तर नहीं रहूंगा।” बनारसवाले बाबू संपूर्णानन्द ने दो साल में ऐसी हालत पैदा कर दी कि गिरी को तबादले पर उत्तर से सुदूर दक्षिणी प्रदेश केरल के राजभवन जाना पड़ा।

मोतीलाल वोरा को सूरज ढले उस सप्ताहांत (शुक्रवार की रात, 2 जून 1995) राजभवन में पता लगा कि दलितपुत्री मायावती को समाजवादी पार्टी के यादवों ने मीराबाई मार्ग—स्थित राज्य अतिथिगृह में जकड़ रखा हैं। हजरतगंज थाने का दरोगा अतर सिंह यादव बहुजन समाज के विधायकों को सपा सरकार के पक्ष के लिए बलपूर्वक तोड़ रहा है, तो वोराजी ने कठपुतली गवर्नर रहने के बजाये, मायावती को राजभवन बुलवाया, सुरक्षा ही नहीं दी, बल्कि उन्हें मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी। भाजपा—बसपा संयुक्त की सरकार बनवा दी। उच्चतम न्यायालय के निर्देश की आवश्यकता खारिज कर दी कि बर्खास्तगी के पूर्व मुख्यमंत्री (मुलायम सिंह यादव) को सदन में बहुमत दिखाने का मौका दिया जाये। (एस.आर. बोम्मई बनाम भारत सरकार)।

मुलायम सिंह यादव भी समझ गये थे कि राज्यपाल ने राजनीति शुरु की थी राजनन्दगांव में घाघ समाजवादियों मधु लिमये तथा जॉर्ज फर्नांडिस के शिष्य के रुप में। वोराजी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (संसोपा) के छत्तीसगढ़ क्षेत्र (तब मध्य प्रदेश) में अगुवा रह चुके थे।

वोराजी ने इतिहास रचा जब वे अविभाजित मध्य प्रदेश के राज्यमंत्री से सीधे मुख्यमंत्री पद पर राजीव गांधी द्वारा नामित हुये थे। हालांकि कुंवर अर्जुन सिंह ने अपनी आत्मकथा (हेहाउस इंडिया प्रकाशक, 2012, पृष्ठ 184—85) में लिखा कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी के पूछने पर, अर्जुन सिंह ने मोतीलाल वोरा का नाम अपने उत्तराधिकारी के लिये सुझाया था। एक दिन पूर्व ही (11 मार्च 1985) को अर्जुन सिंह मध्य प्रदेश कांग्रेसी विधानमंडल दल में नेता चुने गये थे। उनकी नियुक्ति दूसरे ही दिन आपदाग्रस्त पंजाब के राज्यपाल पद पर हो गयी थी। वोराजी की लोकप्रियता का सबूत है कि उस दौर के पार्टी दिग्गज श्यामाचरण शुक्ल, दिग्विजय सिंह, माधवराव सिंधिया आदि, राजीव गांधी के भी चहेते थे। कैसा संयोग है कि जोधपुर (राजस्थान) के सवर्ण (मारवाड़ी विप्र) वोराजी ने दुर्ग (छत्तीसगढ़) में मीडियाकर्म तथा राजनीति शुरु की थी। मध्यप्रदेश में जन्मे श्री शिवचरण माथुर राजस्थान के मुख्यमंत्री बने थे।

जीवन के इन प्रारंभिक वर्षों में ही पत्रकार के नाते वे इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (IFWJ) से संबद्ध मध्य प्रदेश श्रमजीवी पत्रकार यूनियन से जुड़ गये थे। यह रिश्ता उन्होंने अंत तक बनाये रखा। रायपुर में प्रदेश यूनियन के अधिवेशन में यूपी के राज्यपाल के नाते, वोरा मुझे लेकर लखनऊ से रायपुर गये थे। वापसी पर उनके जहाज में तकनीकी खराबी के कारण हमें ढाई सौ किलोमीटर दूर नागपुर में रात को रुकना पड़ा। अगली सुबह उन्हें लेकर मैं बापू के सेवाग्राम गया। जहां मेरी बाल्यावस्था बीती थी। यादगार यात्रा रही।

वोराजी द्वारा IFWJ की राष्ट्रीय परिषद का अधिवेशन जयराम आश्रम (हरिद्वार) में 1993 में हुआ था। भीषण वर्षा के बावजूद वोराजी खराब मौसम को नजरंदाज कर अपने प्रमुख सचिव (बाद में रक्षा तथा राज्यसभा के सचिव रहे) डा. योगेन्द्र नारायण के साथ जहाज से हमारे सभा स्थल में आये थे। अपने अध्यक्षीय संबोधन में मैंने वोरा के पत्रकारी जीवन की चर्चा की थी। फिर मेरी अध्यक्षता में नैनीताल में Confederation of Asian Journalist Unions (CAJU) का अधिवेशन था। किन्तु हवाला काण्ड में उनका नाम आया था। उसी दिन उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा था। नहीं आ पाये। हालांकि बाद में वे निर्दोष साबित हो गये थे। लखनऊ प्रेस क्लब में हमारे राज्य यूनियन के अध्यक्ष हसीब सिद्दी द्वारा आयोजित National Federation Newspaper Employees Unions के राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन वोराजी ने किया था। मुख्यमंत्री मुलायम सिंह मुख्य अतिथि थे।

IFWJ की वर्किंग कमेटी के सदस्य रहे साथी लज्जाशंकर हरदेनिया बताते है कि सन् 1984 के दिसंबर माह में भोपाल में हुए बहुचर्चित गैस कांड में कई हजार लोग मारे गए थे। वोरा ने गैस पीड़ितों को राहत पहुंचाने के व्यवस्थित प्रयास किए। उन्होंने गैस राहत सलाहकार समिति बनाई। स्वयं वोरा इस समिति के अध्यक्ष बने। एक पृथक गैस राहत विभाग की स्थापना की गई। गैस पीड़ितों के लिए अलग अस्पताल खोले गए। स्वयं वोरा गैस पीड़ित इलाकों में बार-बार जाते रहे।

ऐसे परम स्नेही और हमारी IFWJ की मध्य प्रदेश इकाई के कर्मठ सदस्य रहे मोतीलाल वोरा को हम सादर श्रद्धांजलि देते है। उनका अभाव अखरेगा, सदैव।

 

©के. विक्रम राव, नई दिल्ली

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