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बदल रही दुनिया …

 

पलक झपकते ही दुनिया में

सब बदल जाता है

कभी सवेरा तो कभी शाम हो जाता है

सन्नाटे से भी आवाज़ आती

बिन बादल बरसात भी है आती

अंतर्मन की कोलाहल

अकुलाहट बन रह जाती

स्वतंत्र होकर उड़ने को

मन व्याकुल रहता है

अपनी ही कामनाओं से

हृदय जुस्त जु करता है

कभी समाज के लालछन ने

तो कभी अपनों की रुसवाई ने

ख़ामोश सा कर डाला हो

हर पल बदलती दुनिया की तस्वीर निहार

किसी अपने को ढूंढ रहे हो

दोस्ती की एक नई पतवार ढूंढ रहे हो

काग़ज़ के पन्नों पर क्या बयां करे

पल पल बदलते संसार की रीत को

अपनी ही चोट से जख्मी हुए बैठे हैं

पलक झपकते ही दुनिया बदलते देख रहे हैं हम।।

 

©डॉ. जानकी झा, कटक, ओडिशा                                  

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