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‘नई सदी का नया मानव’ मीरा हिंगारानी के जीवन का निचोड़ …

पुस्तक समीक्षा

मीरा हिंगोरानी-एक कवयित्री, लेखिका, व्यंगकार, साहित्य की लगभग सभी विधाओं में उन्होंने लेखन किया है। दूरदर्शन पर उनके भजनों का प्रसारण व आकाशवाणी से कहानियों का प्रसारण हुआ है। आज 85 साल की उम्र में भी वे उतनी ही सक्रिय हैं। उनकी इस आयु की सक्रियता देख कर प्रेरणा मिलती है और जतला देती है कि लेखक जैसे जैसे उम्रदराज होता है, वैसे वैसे उसका लेखन अधिक परिपक्व व युवा हो जाता है। जिस उम्र में लोग रिटायर होने वाले होते हैं, उन्होंने शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ग्रहण की। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में उनकी 500 से अधिक रचनाओं का प्रकाशन हुआ है। डाक्टर बाबा साहेब अंबेडकर पुरस्कार, ‘इंदौर‘ से सम्मानित मीरा जी की कुछ रचनाओं का यहां पर उल्लेख करना चाहूंगी।

यादों में बसी मां- ‘दीवार पर टंगी घड़ी आज भी मां की यादों को ताजा करती है‘ पंक्तियों से शुरू होती कविता किसी के ह्रदय को भी अपनी दिवंगत मां की स्मिृतियों में डुबोकर बेचैन करने की क्षमता रखती है। ‘काली पड़ गई थी कुंदन सी काया, मैं छोटा न समझ पाया, सदा चुस्त रहने वाली मां क्यों चादर ओढ़ आज, सोई है सदा के लिए‘

याद आई मां-‘कागज सारे मोड़े मैंने लिखा कोरे कागज पे मां और-आगाज़ गज़ल का हो गया………बंटवारे में मैंने मां को पाया, मां को पाया‘

उनकी अधिकतर कविताओं मां अपनी पूरी गरिमा से मुस्कुराती है।

कश्मीर घाटी के घटनाक्रम पर लिखी उनकी कविता-‘सूली पर टंगी लाश, खूनी सड़कें, अधजली लाशों के अम्म बार…कैद पूरी घाटी। आतंकी शिकंजे में।

कुकुरमुत्ते- मनुष्य का दिल दिमाग हमेशा अनेकों प्रश्नों से भरा रहता है। जिसके लिए वे अपनी कविता ‘कुकुरमुत्ते‘ में कहती हैं, ‘न जान पाई हूं कौन? जाना कहां है मुझे। ऐसे कई प्रश्न, प्रश्नों के कुकुरमुत्ते आज, उग आए मेरे आंगन में‘

हादसे-‘हादसे कभी बोलकर नहीं आते, न दस्तक देते दरवाजे पर….कनखजूरा की तरह चले आते हैं भावों की दहलीज पर‘ चंद शब्दों में कवयित्री हादसों की त्रासदी बयान कर देती है।

उनकी पुस्तक ‘नई सदी का नया मानव‘ काव्य, कहानी व लेखों का संगह है। तीनों विधाओं को एक ही पुस्तक में समेटना व पढ़ना, निश्चित ही एक नायाब अनुभव होगा। लेखिका, कवयित्री, व्यंगकार, शास्त्रीय संगीत की गायिका मीरा जी को मेरा सादर अभिनंदन व इस सुंदर पुस्तक के लिए हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।

©सुधा जुगरान

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