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पतंगे…

ये रंग बिरंगी पतंगे
आसमान में विचर रहीं
बेपरवाह आवारा सी
लहरा लहरा के नाच रहीं
रंग बिरंगी सजी संवरी
हर रूप में आकार में
पंछियों से दो चार करतीं
इस पल में कभी उस पल में
पर ये क्या मंजा काट दिया
अब गिरी कि तब गिरी
आवारापन सब ढय गया
सारा घमंड अब टूट गया
लूट मची और झपट गई
किसी और की अब हो गई
समझ गई क़िस्मत अपनी
कुछ पल की सीरत अपनी
उस पर किसी का अधिकार नहीं
उसकी ख़ुशियों का अम्बार नहीं
जिसने पाला पोसा सजाया
पर वो है एक नाम पराया
ये कैसा रिवाज है
ये कैसी परम्परा है !!

©ऋचा सिन्हा, नवी मुंबई, महाराष्ट्र

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