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शहर देखा है …

(ग़ज़ल)

 

उसको देखा ही नहीं, उसका शहर देखा है

हमने मंज़िल के बहाने ही सफ़र देखा है

 

तेरी आँखों में कभी हमने अगर देखा है

यार अपनों की जगह ग़ैर का घर देखा है

 

ये भी मुमकिन है असर ना हो कभी सोहबत का

प्यार की शाख पे नफ़रत का समर देखा है

 

इतने बेरंग ज़माने में भी इन आँखों ने

रंग पल-पल में बदल देता बशर देखा है

 

कितनी ही बार मुँडेरों पे तेरी इस छत की

साथ में जुगनुओं के बैठा क़मर देखा है

 

लोग कहते हैं कि वो शाइरी में कच्चा है

उसकी ग़ज़लों में मगर हमने असर देखा है

 

उड़ते देखा है जहाजों में सदा किस्मत को

और रस्सी पे “सहर” चलते हुनर देखा है ….

 

 

©ऋचा चौधरी, भोपाल, मध्यप्रदेश

परिचय:- शिक्षा- बीएससी, एमए इतिहास, बीएड, वीर रस के अंतरराष्ट्रीय कवि चौधरी मदन मोहन समर की भतीजी.

 

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