
SBI रिसर्च ने बताया आगे का रास्ता, क्या रुपये में लौटेगी मजबूती?
भारत के पास 700 अरब डॉलर से ज्यादा का विदेशी मुद्रा भंडार है। यह इतना बड़ा है कि 10 महीने के आयात को आसानी से संभाल सकता है। शॉर्ट टर्म कर्ज भी सीमित है। यानी कागज पर सब कुछ मजबूत दिखता है। फिर भी रुपया फिसल रहा है। रिपोर्ट कहती है, यह कमजोरी उतनी नहीं है जितनी दिख रही है। असल में बाजार में अनिश्चितता और डॉलर की मांग ने दबाव बनाया है। ऐसे में RBI के पास पूरा मौका है कि वह बाजार में उतरकर रुपये को संभाले।
फिर भी क्यों कमजोर रुपया?, 700 अरब डॉलर का कवच
वैश्विक बाजार में हलचल है, डॉलर मजबूत है और रुपया लगातार दबाव में। सवाल वही उठ रहा है जो कभी 2013 में उठा था… क्या भारत फिर उसी मोड़ पर खड़ा है? लेकिन SBI रिसर्च की रिपोर्ट एक अहम बात साफ करती है, इस बार कहानी अलग है। डर बड़ा दिख रहा है, लेकिन बुनियाद पहले से कहीं ज्यादा मजबूत है।
रुपये को 92 से गिरकर 94.8 प्रति डॉलर तक पहुंचने में सिर्फ 23 दिन लगे
| डॉलर रेंज (₹) | समय (दिनों में) |
|---|---|
| 65 से 70 | 1815 दिन |
| 70 से 75 | 581 दिन |
| 75 से 80 | 917 दिन |
| 80 से 85 | 819 दिन |
| 85 से 90 | 349 दिन |
| 90 से 91 | 13 दिन |
| 91 से 92 | 78 दिन |
| 92 से 94.8 | 23 दिन |
तेल कंपनियां बना रही हैं दबाव
हर दिन तेल कंपनियों को भारी मात्रा में डॉलर की जरूरत होती है। यही मांग बाजार में रुपये पर अतिरिक्त दबाव बना रही है। रिपोर्ट का बड़ा सुझाव है कि इन कंपनियों के लिए अलग डॉलर विंडो बनाई जाए। अगर ऐसा होता है, तो बाजार में असली मांग और सप्लाई साफ दिखेगी और रुपये पर अचानक पड़ने वाला दबाव कम हो सकता है।
बैंकिंग सिस्टम में नई उलझन
रुपये की कमजोरी के बीच एक और समस्या उभर रही है। RBI के नए नियमों के कारण ऑनशोर और ऑफशोर बाजार में फर्क बढ़ गया है। इससे डॉलर की उपलब्धता और मुश्किल हो सकती है। विदेशी बाजार में प्रीमियम तेजी से बढ़ रहा है और बैंक अपनी पोजिशन संभालने में उलझे हुए हैं। रिपोर्ट चेतावनी देती है कि अगर इसे सही तरीके से नहीं संभाला गया, तो यह एक नया संकट पैदा कर सकता है।
रुपये की गिरावट, लेकिन कहानी पूरी अलग
दिलचस्प बात यह है कि जब दुनिया की ज्यादातर करेंसी मजबूत हो रही थीं, तब भी रुपया गिर रहा था। इससे यह साफ होता है कि रुपये को “शॉक एब्जॉर्बर” बनाकर हर दबाव झेलने देना सही रणनीति नहीं है। एक सीमा के बाद यह तरीका उल्टा असर कर सकता है।
| करेंसी (USD के मुकाबले) | % बदलाव (02.04.2025 से 27.02.2026) | % बदलाव (27.02.2026 के बाद) |
|---|---|---|
| डॉलर इंडेक्स | -6.0 | 2.7 |
| यूरो | 8.8 | -2.7 |
| ब्राज़ीलियन रियल | 9.4 | -2.2 |
| ब्रिटिश पाउंड | 3.9 | -1.8 |
| चीनी युआन | 5.6 | -0.7 |
| इंडोनेशियाई रुपिया | -0.4 | -1.3 |
| भारतीय रुपया | -6.4 | -4.2 |
| साउथ अफ्रीकन रैंड | 15.4 | -7.6 |
| फिलीपींस पेसो | -0.8 | -5.3 |
| मलेशियन रिंगिट | 12.6 | -3.5 |
| पोलिश ज़्लॉटी | 6.9 | -4.4 |
| रूसी रूबल | 8.7 | -5.1 |
| थाईलैंड बात | 9.0 | -5.9 |
| साउथ कोरियन वॉन | 1.5 | -5.3 |
| जापानी येन | -3.9 | -2.2 |
रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि अब RBI को थोड़ा और आक्रामक रुख अपनाने की जरूरत है। सिर्फ इंतजार करने से काम नहीं चलेगा। जरूरत पड़ने पर विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल करके रुपये को सहारा देना होगा, ताकि बाजार में अनावश्यक गिरावट रोकी जा सके। इसके साथ ही सिस्टम में लिक्विडिटी यानी नकदी का संतुलन बनाए रखना भी जरूरी है, ताकि अचानक पैसों की कमी से हालात और खराब न हों। रिपोर्ट यह भी कहती है कि RBI को ब्याज दरों को संतुलित रखने के लिए Operation Twist जैसे कदमों पर भी विचार करना चाहिए, जिससे बाजार में स्थिरता बनी रहे।
अब बात करते हैं Operation Twist की। आसान भाषा में समझें तो यह एक ऐसा तरीका है जिसमें RBI छोटी अवधि और लंबी अवधि के बॉन्ड्स के साथ खेलता है। इसमें RBI छोटी अवधि वाले बॉन्ड बेचता है और लंबी अवधि वाले बॉन्ड खरीदता है। इससे छोटी अवधि की ब्याज दरें ऊपर जाती हैं और लंबी अवधि की दरें नीचे आती हैं या स्थिर रहती हैं। इससे फायदा क्या होता है? जो लोग लंबे समय के लिए लोन लेते हैं, जैसे घर या बिजनेस के लिए, उनके लिए कर्ज ज्यादा महंगा नहीं होता। बाजार में संतुलन बना रहता है और अर्थव्यवस्था पर ज्यादा दबाव नहीं पड़ता। साथ ही इससे रुपये को भी थोड़ा सहारा मिलता है।
पुरानी गलतियों से सीख जरूरी
2008 और 2013 के संकट में RBI ने कई बड़े फैसले लिए थे, जैसे ब्याज दर बदलना, डॉलर स्वैप स्कीम लाना और खास विंडो बनाना। उन कदमों से हालात संभले थे। लेकिन रिपोर्ट कहती है कि आज वही कदम कॉपी करने की जरूरत नहीं है। आज के हालात अलग हैं, इसलिए समाधान भी नया होना चाहिए।















