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कोरोना में निचले तबकों में बढ़ी मनोरोगियों की तादाद …

दिल्ली में आजकल शादियों का दौर जोरो पर है और कोरोना का भी। लोग बेपरवाह हो रहे हैं और कोरोना अपनी जड़े जमा रहा है। हैरानी की बात यह है कि सोशल डिस्टेंसिंग के इस जमाने में शादियों में पहले की ही तरह बैंड-बाजे, ढोल, घोड़ा सबका इंतजाम है। कोरोना काल में बैंड बजाने वाले दूसरों की खुशियों में शामिल तो हो रहे है लेकिन, दिमाग में उनके कुछ और ही चल रहा है। कोरोना के नौ महीने ठप्प पड़े इनके काम ने इन्हें कई मानसिक विकारों की तरफ धकेल दिया है। कोरोना दौर से पहले ही विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO ने 2020 तक भारत में करीब 20 फीसद आबादी के मानसिक रोगियों में तब्दील होने का खतरा बताया था। लेकिन, इसी साल आई महामारी और इससे मची अफरा-तफरी में क्या सिर्फ 20 फीसद आबादी को ही मानसिक विकार हुए होंगे।

रामबीर (कंपनी का नाम न बताने की शर्त पर) जो फिलहाल एक बैंड कंपनी में बैंड बजाने का काम करते है ने बताया, “हम तो जिंदा बच ही गए यही बड़ी बात है। हमारी तो कमाई ही मौसमी है। गर्मी तो सारी बेरोजगारी में ही कट गई। घर में कई दिन चूल्हा ही नहीं जला। जैसा भी था मैने बच्चों को भंडारे से लाकर खाना खिलाया। महीनों तो हम बहुत तनाव में रहे समझ में ही नहीं आया कि यहां दिल्ली में रहे या गांव वापस जाएं। अब कुछ काम तो मिला है लेकिन, पहले जैसी कमाई नही।” मार्च से करीब अक्तूबर तक दिल्ली में शादियों में बैंड नहीं बजा। लॉकडाउन तो खुलने लगा था लेकिन, 50 और बाद में 100 लोगों की सरकारी अनुमति मिलने के बाद लोग छोटे बैंकेट हॉल या घरों और बिल्डिंग की छतों पर ही टेंट लगाकर शादी के फंक्शन कर रहे थे। इस लंबे लॉकडाउन में कई तरह के धार्मिक आयोजनों में भी लोग बैंड बजवाते थे लेकिन, इस पूरे साल बैंड बाजे वाले काम को तरसते रहे। रामबीर जैसे इस तबके के कितने ही लोग तो हर वक्त इसी तनाव में डूबे रहे कि सोशल डिस्टेंसिंग कैसे हो। छोटे-छोटे कमरों में एक साथ कई लोगों के रहने और एक ही शौचालय के इस्तेमाल ने इनकी रातों की नींद छीन ली।

अशोक दिल्ली में पिछले 15 सालों से ऑटो चला रहे हैं। अशोक ने बताया, “दो-ढाई महीने कैसे गुजरे उन्हें तो मैं कभी भूल ही नही सकता। घर में लोगों ने राशन भरना शुरू कर दिया था लेकिन हमारे पास इतना पैसा कहां कि हम एक या दो महीने का राशन जोड़ पाएं। बच्चे छोटे फिर ऑटो भी किराए का तो इतना पैसा जमा भी नहीं कि पत्नी-बच्चों को गांव भेज दें।” ऑटो अब सड़कों पर दौड़ते तो जरूर दिख जाएंगे लेकिन, सवारियां इनको अब पहले जैसे नहीं मिल रही। कोरोना के इन महीनों ने आर्थिक तौर से इनकी कमर तोड़ दी है। एक और ऑटो चालक संदीप कहते है, “लॉकडाउन खुलने के बाद सवारियां तो कम हुई है लेकिन, अब हमारा खर्च भी बढ़ा है जैसे मास्क, सैनिटाइजर, दस्ताने खरीदने का और हमको सैनिटाइजर का स्प्रे भी रखना पड़ता है क्योंकि अक्सर सवारियां उन ऑटो में नहीं बैठती जिनकी सीटें ड्राइवर उसी समय सैनिटाइड न करे। तो यह खर्चा अलग से हमारे सिर पर पड़ा है।”

हालांकि, दिल्ली सरकार के पास अप्रैल तक 1.6 लाख लोगों ने इस रकम को पाने के लिए आवेदन किया है। इन आवेदन में ऑटो, टैक्सी, ई-रिक्शा और फटफट सेवा के ड्राइवर शामिल हैं। कोरोनावायरस के बढ़ते संक्रमण को रोकने के लिए किए गए लॉक डाउन की वजह से इन सभी लोगों की रोजी-रोटी पर संकट उत्पन्न हो गया था। दिल्ली सरकार के परिवहन मंत्री कैलाश गहलोत ने अप्रैल में जानकारी दी कि करीब 23,000 ड्राइवर के बैंक खाते में ₹5000 की रकम ट्रांसफर कर दी गई है और 20,000 अन्य ड्राइवर का वेरिफिकेशन पूरा कर लिया गया है। जिनके खाते में भी यह रकम जल्द ही ट्रांसफर हो जाएगी। 1.6 लाख में से 43,000 को ही ये मदद मिल पाई बाकी फिलहाल इसे लेने की जद्दोजहद में है। लेकिन इस दौरान अशोक और संदीप जैसे कितने ही कम आय वर्ग के लोगों को मानसिक तनावों का सामना करना पड़ा और अब भी कर रहे है। दिल्ली की एक गैर-सरकारी संस्था (जो खासकर दिल्ली के ऑटो चालकों के साथ काम करती है) मनस फाउंडेशन ने कोरोना से पैदा हुए आर्थिक संकट से जूझते करीब 1,200 ऑटो ड्राइवरों से बात की। स्टडी में मालूम हुआ की 75 फीसद ड्राइवर ऐसे है जो कोरोना-19 के शुरूआती दौर में ही डिप्रेशन और पैनिक अटैक का सामना कर रहे थे जबकि कुछेक को इनसोमिना या अनिद्रा का विकार हुआ।

आज भी मानसिक तनाव और एंजाइटी का शिकार हैं रमेश, जो बताते है, “मेरा एक छोटा-सा चाय का ठिया है जहां मैं चाय, बिस्कुट और मट्ठी बेचता था कोरोना ने सब चौपट कर दिया। जमापूंजी भी हमने खत्म कर दी क्योंकि खाने-पीने और बच्चों की क्लास के लिए एक स्मार्टफोन खरीदने में खर्च हो गई। अब आगे की जिंदगी कैसे चलेगी यह सोचकर हमें डर लगता है।” रमेश ओखला स्थित फोर्टिस एस्कोर्टस अस्पताल की सड़क किनारे चाय की दुकान चलाते हैं। महारानी बाग और तैमूर नगर की सड़क किनारे नाई की दुकान चलाने वाले रफीक ने बताया, “पैसों की तंगी की वजह से कोरोना की शुरूआत में ही उनका मन किया कि खुदकुशी कर लें लेकिन, फिर बच्चों का ख्याल आया तो इरादा बदल दिया। मैं मार्च से ठीक से नहीं सो पा रहा हूं। रात में कभी भी नींद खुल जाती है तो फिर दोबारा आती ही नहीं। बेवजह का चिड़चिड़ापन बहुत हो गया है अब तो लगता है कभी भी कुछ भी हो सकता है।“ रफीक के दो बच्चे है जो गांव में रहते हैं इनको लॉकडाउन से लेकर अब तक पूरा पोषण नहीं मिल पा रहा है और कब से मिलेगा यह भी तय नही यानी सबकुछ अनिश्चित। परिवार से दूर रोजगार के लिए अकेले शहर में रहने वाले लोगों की मानसिक हालत तो और भी तेजी से बिगड़ी इस बीच। सड़क किनारे बैठे मोचियों की पूछिए ही मत वे तो दिखना ही बंद हो गए। उनका काम तो बंद ही हो गया और ये लोग डिप्रेशन में पूरी तरह से चले गए हैं।

कोरोना के शुरूआत से ही असंगठित सेक्टर में काम कर रहे लोग ही सबसे ज्यादा आर्थिक मार और इसकी वजह से पैदा हुए ढेरों मानसिक विकारों का शिकार बने हैं। ये लोग अचानक लगाए गए लॉकडाउन के चलते सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों से मिलने वाली मदद पर पूरी तरह से निर्भर हो गए। खाना-पीना, रोजी-रोजगार और बच्चों की पढ़ाई और उनका शून्य होता भविष्य इन लोगों को धीरे-धीरे कर मानसिक रोगी बनाता जा रहा है और जो पहले से ही किसी न किसी मानसिक विकार से जूझ रहे थे उन्हें और गंभीर विकारों की तरफ ठेलता जा रहा है। ‘Labouring Lives: Hunger, Precarity and Despair amid the Lockdown’ नाम के सर्वे में कम आय वर्ग के करीब 1405 लोगों से बात कर यह पाया कि कोरोना और इसके बाद लगे लॉकडाउन में उम्मीदों से परे इस वर्ग के लोगों ने परेशानियों का सामना किया। रोजगार खो जाना, हाथ में पैसा न होना और कर्ज के बोझ तले ये लोग बेहद मजबूरी में अपना गुजर-बसर करने को मजबूर हैं। इन हालातों में किसी भी इंसान की मानसिक सेहत कैसी होगी यह बताना अब यहां जरूरी नहीं लगता। यह सर्वे रोसा लक्जमबर्ग-स्टिफटंग की मदद से सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज ने दिल्ली रिसर्च ग्रुप और कारवां-ने-मोहब्बत के साथ मिलकर किया था।

दिल्ली के पॉश न्यू फ्रेडस कॉलोनी के कम्युनिटी सेंटर में शीश शॉवरमा नाम से एक छोटे रेस्तरां के साझेदार अनीस बताते हैं, “लॉकडाउन तो खत्म हुआ लेकिन, अब भी हमारा काम पहले जैसा नही चल पा रहा है। डर इस बात का है कि अगर ऐसा ही कुछ महीने और चला तो मेहनत की कमाई से जोड़ी साझेदारी खत्म हो जाएगी।“ छोटे रेस्तरां या ढाबे में काम करने वाले, दर्जी या इमारतें बनाने वाले मजदूरों की हालत तो और भी खराब हुई इनमे से कई तो अपने कमरों का किराया न दे पाने की हालत में अपने परिवारों समेत फ्लाई ओवर के नीचे खुले में रहने को मजबूर हुए। सरस्वती के चार बच्चे हैं और चारों स्कूल जाने वाले। वह ईश्वर नगर और सुखदेव विहार के घरों और कोठियों में खाना पकाने, बर्तन और साफ-सफाई का काम करती है। पति सफेदी का काम करता है पैसा घर में दिया तो दिया नहीं तो सरस्वती के पैसों से ही अब तक उसका घर चल रहा था। कोरोना के शुरू होते ही इनका एक झटके में जो काम छूटा तो आज तक वही काम वापस न मिल पाया। महामारी ने इनके परिवार को किराए का कमरा छोड़ गांव जाने को मजबूर किया। वहां स्मार्टफोन और इंटरनेट न हो पाने की वजह से चारों बच्चों की पढ़ाई खराब हुई। इन्होंने बताया,“कमरा खाली इसलिए करना पड़ा कि मालिकों ने सिर्फ मार्च का ही पैसा दिया उसके बाद नहीं। मकान मालिक ने भी किराया माफ नही किया। क्या करते कितने दिन भंडारे का खाते वह भी पूरा नही पड़ पा रहा था। आटा, सब्जी सब मंहगा हो गया था और गैस सिलेंडर खरीदने के भी पैसे नहीं थे हमारे पास। सो सोचा कि गांव में कम से कम भूखे तो नही मरेंगे।“ ये हालत सिर्फ इन्हीं की नही थी बल्कि शहर में इस तरह का काम करने वाली कमोबेश सभी डोमेस्टिक वर्कर्स की थी और इन्हीं अनसुलझी चिंताओ ने इन्हे अचानक तनाव, डिप्रेशन, अनिद्रा, एंजाइटी पोस्ट-ट्रौमैटिक स्ट्रेस डिस्आर्डर (पीटीएसडी) की तरफ धकेला।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज, बंगलुरू में प्रोफेसर और परिवर्तन ट्रस्ट से जुड़े डॉक्टर सुदीप्तो चटर्जी के मुताबिक भारत की अर्थव्यवस्था का 94.3 फीसद असंगठित क्षेत्र से आता है जिनको सीमित सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा मिलती है। डॉक्टर सुदीप्तो बताते हैं,“जहां तक मानासिक स्वास्थ्य की बात आती है तो कुछ रिस्क फैक्टर होते है जो निजी, परिवार और समाज के स्तर पर होते हैं और ये सभी कारण मिलकर किसी भी इंसान के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालते हैं। हालांकि ऐसा नही है कि पहले कम आय वर्ग के लोगों में तंगी नहीं थी या गरीबी नही थी लेकिल, कोरोना के दौर में खासकर इस तंगी की वजह से मानसिक रोगियों की न सिर्फ तादाद बढ़ी है बल्कि, रिस्क फैक्टर पहले से ज्यादा बढ़ा है।“ उन्होंने कहा, “मौजूदा वक्त की परेशानी को दो तरह से देखा जा सकता है। पहला तो यह कि बेरोजगारी और आर्थिक तंगी से इंसान डिप्रेशन में चला जाता है जिससे प्रोडक्टिविटी कम होती है जिससे मानसिक सेहत की परेशानियां होती है और इसी वजह से इकोनॉमिक प्रोडक्टिविटी और गिर जाती है।“ उनका कहना था कि मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता का माहौल तो पहले के मुकाबले काफी बढ़ा है लेकिन, मानसिक स्वास्थ्य को जन स्वास्थ्य का एजेंडा बनाने से हालात और ज्यादा बेहतर होने की उम्मीद है।

हालांकि, सरकार ने, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने और कई सारे गैर-सरकारी संस्थानों ने मुसीबत में फंसे, अकेले या परिवार सहित भूखे, बेरोजगार और मानसिक तनावों से घिरे लोगों की कांउसिलिंग के लिए हेल्पलाइन नंबर भी शुरू किए। लेकिन, सही जानकारी और खर्च का बोझ न उठा की वजह से बहुत लोगों को इन हेल्पलाइन नंबरों का फायदा ही नही पहुंच पा रहा है। फिर इस दौरान लोगों की मानसिक सेहत को आधी-अधूरी या गलत आ रही खबरों ने भी बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हर वक्त टीवी, रेडियो और अखबरों में कोरोना या भूख-प्यास से मरने वाले मजदूरों की मौत जैसी खबरों ने इस वर्ग पर खासकर उनकी मानसिक सेहत के मद्देनजर ज्यादा बुरा असर डाला। The National Mental Health Survey, 2015 मे यह अनुमान लगाया गया था कि करीब 90 फीसद भारतीयों को किसी भी तरह की मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी देखभाल नहीं मिलती। हालांकि, अब यह समझने की बेहद जरूरत है कि मानसिक बीमारियों या विकारों से जूझ रहे इन लोगों को अगर जल्द ही रोजी-रोजगार न मिला तो देश और समाज के हालात क्या हो सकते है। अपने अनिश्चित भविष्य के डर ने देश की इस आबादी को मानसिक तौर पर जहां लाकर खड़ा किया है उसपर सरकार का जल्द ही कोई फैसला देश को आने वाली दूसरी महामारी से बचा सकता है।

 

©नरजिस हुसैन, दिल्ली     

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