लेखक की कलम से

ठहर ठहर ….

वो ठहर- ठहर  कर चलता हैं

वो  बागों  में जा  फिरता  हैं,

ऐसा  क्यूँ हरपल करता हैं

किसके यादों में  करता हैं।

 

दर्पण से वो बातें करता हैं

मन ही मन हॅंसते रहता हैं,

क्यूँ ऐसा हाल हुआ उसका

किसी से वो नही कहता हैं।।

 

रातों को भी वो नहीं सोता हैं

किसके यादों गीत गुनगुनाता हैं

नाम पूछो तो  इधर-उधर करता हैं

नीदो में भी वो हरपल रोता हैं।।

 

एक दिन उसने  मुझको

बात बताया मुझको

प्यार किसी से मत करना

ऐसा कह दिया मुझको।।

 

 

©अर्पणा दुबे, अनूपपुर                  

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