
इकोनॉमी
उड़ा प्रेम का इत्र……
चूहे जैसा कुतर रहा है
वक्त पुराने चित्र
यादों की अलमारी में अब
कुछ ही कतरन शेष
उनमें भी बस वही बचीं हैं
जो थीं बहुत विशेष
मतभेदों की सीलन भी थी
दींमक की घुसपैठ
और व्यस्तताओं ने मन पर
इतनी डाली ऐंठ
अनजानी सूरत लगते हैं
सभी पुराने मित्र
दबे-दबे ही डायरियों में
सूख गये हैं फूल
अलग-अलग हो गईं पंखुड़ी
शब्दों पर भी धूल
टूट गये हैं तार पुराने
सरगम भूली राह
अपने ही ग़म सहलाते हैं
नहीं किसी की चाह
एहसासों की गंध न बाकी
उड़ा प्रेम का इत्र
रिश्ते केवल नंबर बनकर
मोबाइल में क़ैद
हाथ कभी जो थे काँधे पर
हुए सभी नापैद
जीवन की आपाधापी में
छूटे सारे मेल
बहुत दूर तक ले आयी है
ज़रूरतों की रेल
इसी सफ़र में चेहरे बदले
बदले सभी चरित्र
©गरिमा सक्सेना बैंगलुरू
















