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ऐसी ही ज़िन्दगी जीती हूं मैं…

पतंग की डोर से बंधी नहीं मैं
पतंग उड़ाने वाले से कटी नहीं मैं

तिल से तिल तिल जली नहीं मैं
मुगफली की छिलके की तरह सख़्त रही मैं

बस ज़ुबान पर गजक सी मिठास रख जीती रही मैं
पतंग ख़ुद के सपनों की उड़ाती हस्ती ख़ुद पर नाज़ करती मैं

पतंग ख़ुद की सत रंगी रंग से रंगीन करती रही मैं
हर्षिता हर पल नारी शक्ति को पतंग की डोरी में बंधा नहीं पाती मैं

खुली आंखों खुले आकाश में ख़ुद को उड़ने देना चाहती मैं
नारी हर रंग से रूप से घर को प्रेम की इसी डोरी से बांध कर रखती ऐसी ही ज़िन्दगी जीती मैं

© हर्षिता दावर, नई दिल्ली

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