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साँझ

साँझ ढलने को है
दीप जलने को है
कालिमा गगन की
गहरी होने को है
दीप की रौशनी
रौशन होने को है
मंदिर की घंटियाँ
गुनगुनाने को हैं
पंछीयों का झुंड भी
नीड़ में जाने को है
मवेशी चारागाह से
मांद में आने को हैं
थका हारा मानव भी
घर लौटने को हैं
घर के चूल्हे पर
कुछ तो पकने को है
राह से भीड़ भी
अब छँटने को है
गुलाबी हवा भी अब
सरसराने को है
नक्षत्रों का समूह अब
प्रदीप्त होने को हैं
ज़िंदगी का एक और दिन
लुप्त होने को है

©ऋचा सिन्हा, नवी मुंबई, महाराष्ट्र

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