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कृषि मंत्री तोमर के चुनाव क्षेत्र मुरैना से दिल्ली तक राजगोपाल के नेतृत्व में पदयात्रा….

किसानों की जंग में एकता परिषद फिर से संग में

 

प्रसून लतांत | महात्मा गांधी ने कहा था कि किसानों को अपनी अहिंसक ताकत का ख्याल हो जाएगा तो दुनिया की कोई हुकू मत उनके सामने टिक नहीं पाएगी। गांधी जी की यह बात पिछले कुछ दिनों से दिल्ली में चल रहे किसानों के अहिंसक आंदोलन की बढ़ती ताकत को देखकर सच साबित होती हुई दिखने लगी है। दिल्ली में डटे किसानों का धरना दुनिया भर में एक विशाल अहिंसक आंदोलन की मिसाल बन गया है। स्त्री, पुरुष, नौजवान, बुजुर्ग सभी एक साथ जमा होकर इस आंदोलन को अनेक कष्ट झेल कर  एक सशक्त अहिंसक बना रहे हैं। उन पर कई तरह के हमले हो रहे हैं, लांछन लगाए जा रहे हैं। दिल्ली पहुंचने के पहले उन पर लाठियां भी बरसाई गईं और कड़ाके की ठंड में पानी की बोछारें छोड़ी है। लेकिन वे पूरी तरह अहिंसक बने रहे। नतीजा यह हुआ है किसानों के इस आंदोलन की ओर दुनिया भर की ना केवल निगाहें  टिक गई है, बल्कि अलग अलग देशों में इनके समर्थन में जुलूस निकल रहे हैं।

ऐसे में प्रख्यात गांधीवादी विचारक और वरिष्ठ समाज कर्मी और एकता परिषद के संस्थापक राजगोपाल पीवी ने भी सर्व सेवा संघ, सर्वोदय समाज, जल बिरादरी आदि संगठनों के साथ दिल्ली में चल रहे किसानों के आंदोलन को समर्थन देने के लिए पैरों से चल कर दिल्ली पहुंचने के लिए सड़कों पर निकल चुके हैं। वे धौलपुर,आग्रह,मथुरा और पलवल होते हुए दिल्ली पहुंचेंगे।

इसके पहले भी राजगोपाल पीवी एकता परिषद की ओर से भूमि अधिग्रहण पर सरकार के अध्यादेश के खिलाफ

किसानों के आंदोलन को समर्थन देने के लिए दिल्ली तक पदयात्रा कर चुके हैं।

एकता परिषद के संस्थापक राजगोपाल पीवी नए बने कृषि कानूनों को आंदोलित किसानों के हित के लिए एकदम उचित नहीं मानते। उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की है कि वह इन कृषि कानूनों को तत्काल रद्द कर फिर से किसानों के साथ बैठ कर उनकी समस्याओं का समाधान खोजने की कोशिश करे। उन्होंने कहा कि आदिवासियों के लिए कानून बने और इसके लिए आदिवासियों से रायशुमारी नहीं हो। मजदूरों के लिए कानून बनाने के पहले मजदूरों से बात नहीं करे और इसी तरह किसानों के लिए कानून बने और किसानों से ही बात नहीं करें। यह तरीका प्रजातांत्रिक नहीं है। अहिंसक भी नहीं है। सरकार को कानून बनाने के पहले किसानों से बात करनी चाहिए। सरकार को मौजूदा नए कृषि कानून को रद्द कर प्रजातांत्रिक बनने की कोशिश करनी चाहिए।

दिल्ली में किसानों के आंदोलन के समर्थन में  वे 14 दिसंबर को तिल्दा रायपुर से सामाजिक कार्यकर्ताओं और किसानों के साथ दिल्ली के लिए कूच कर चुके हैं। तिल्दा से निकल कर वे उमरिया, कटनी,दमोह,सागर, ललितपुर,झांसी,दतिया होते हुए ग्वालियर पहुंचे। फिर मुरैना से वे 500 साथियों और किसानों के साथ पदयात्रा करते हुए दिल्ली पहुंचेंगे। मुरैना से दिल्ली तक की पदयात्रा इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि मुरैना केंद्रीय कृषि मंत्री का संसदीय चुनाव क्षेत्र है। नए कृषि कानून वापस लेने की मांग पर डटे किसानों के आंदोलन के बीच मुरैना से राजगोपाल पीवी की पदयात्रा पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करने में समर्थ होगी।

राजगोपाल भले इस समय किसानों के समर्थन में पदयात्रा करने निकले हैं लेकिन उनका कहना है कि देश में किसान नहीं बचेगा तो कुछ नहीं बचेगा। विकास का मॉडल कैसा भी हो,अनाज,फल और सब्जियां मानव के वजूद के लिए मूलभूत चीजें हैं। अनाज नहीं तो उस पर निर्भर पिज़्ज़ा सहित अनेक तरह की खाद्य वस्तुएं भी नहीं होगी  इसलिए केंद्र और राज्य सरकारें कुल मिला कर 3.25 लाख करोड़ रुपए की सब्सिडी किसानों को देती है तो कोई मेहरबानी नहीं करती। क्योंकि दूसरी ओर उद्योगों को विभिन्न मदों में कुल छूट 10 लाख करोड़ से अधिक की देती है,जबकि आज भी 62 फीसद लोग और आधे कामगार (48 करोड़) खेती से ही जुड़े हैं। किसानों के समर्थन मूल्य में सत्तर सालों में केवल 26 फीसद की बढ़ोतरी हुई जबकि इसी काल खंड में केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों की आय 130 गुना बढ़ी। शिक्षकों की आय 320 से 380 गुना बढ़ी। यह हकीकत किसानों की दशा को जाहिर करती है। राजगोपाल कहते हैं सरकार किसानों से संवाद नहीं कर रही है। उल्टे आंदोलित होने पर उन पर कई तरह के लांछन लगाए जा रहे हैं इन्हें अलग अलग पार्टियों के दायरे में बांट कर उनकी एकजुटता को खंडित करने की कोशिश कर रही है। सरकार को नए कृषि कानूनों के पक्ष में प्रचार पर पैसे बहाने के बजाय उसे रद्द कर नए सिरे से किसानों से संवाद करना चाहिए। उनका कहना है कि पिछले 25 दिनों से दिल्ली में कड़ाके की ठंड में खुले आसमान के नीचे आंदोलन कर रहे हैं।

यात्रा के दौरान विभिन्न प्रेस कॉन्फ्रेंस में अखिल भारतीय सर्वोदय समाज सम्मेलन के संयोजक राजगोपाल पीवी साफ साफ कह रहे हैं कि कृषि कानून बड़े बड़े कारपोरेट और बड़ी बड़ी कृषि व्यापार कम्पनियों सहित बड़े थोक व्यापारियों के पक्ष में बने है। उनका कहना है कि ये कानून किसान कल्याण के बजाय कारपोरेट कल्याण के कानून हैं। उन्होंने हैरानी जताई है कि सरकार ने स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों पर कोई ध्यान नहीं दिया। बदले में किसानों को मजदूर बनाने वाले कानून बना कर उन्हें तबाही के रास्ते में धकेलने की कोशिश कर रही है। नए कृषि कानून से ना केवल बहुत से किसान मजदूर होंगे  बल्कि बहुत बड़ी आबादी अपना रोजगार खो बैठेगी। निम्न और मध्य वर्ग के लोगों की मंहगाई से जूझना होगा और उनमें से बहुत लोग गरीबी रेखा से नीचे चले जाएंगे। किसान उजड़े तो गांव भी उजड़ जायेंगें।

राजगोपाल पीवी किसानों के समर्थन में निकले हैं। उनके साथ केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर के संसदीय क्षेत्र के किसान हैं और देश भर के सामाजिक कार्यकर्ताओं की फौज है। राजगोपाल पीवी ने प्रधानमंत्री और कृषि मंत्री से मांग कि है वे खुद पहल करें और किसानों को सुनें व उनकी सहमति से समस्याओं का समाधान खोजें।

 

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