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श्राद्ध …..

(लघु कथा )

मेरे एक पंडित मित्र है। न मैंने उसके कभी पैर छुए न कभी आशीर्वाद लिया। हाँ ! इंसानियत का नाता ज़रूर है । जब भी उन्हें किसी चीज़ की ज़रूरत हो या कोई परेशानी हो । तब मैं हर तरह से उनकी मदद करने की कोशिश करता हूँ । मैं उनके पास क्लाइंट (ग्राहक) भी भेज देता हूँ । ताकि उनका घर चलता रहे । मेरे जानकार जब भी अपनी उलझन का हल ज्योतिष से निकलवाना चाहते हैं तो मैं उन्हें अपने इसी मित्र के पास भेज देता हूँ ।

हमारा रोज़ का मिलना है । क्योंकि मेरी दुकान और पंडित की दुकान पास -पास है ।  कई बार वे मेरी गाड़ी में ही वापस घर लौटते हैं । अपने -अपने व्यवसाय के बारे में बात होती है । मेरी पत्नी हिंदी की विदुषी है । लेखिका है । साहित्यिक गतिविधियों में शिरकत करती हैं । उनका हाथ भी पंडित ने कई बार देखा है ।

कल मैंने पंडित को बताया -“कल मैं व्यस्त रहूँगा । मुझे पत्नी को लेकर दो -तीन जगह जाना है । एक बैंक में , एक कॉलेज में , एक साहित्यिक संस्था में । उन्हें सम्मानित करना है । कल हिंदी दिवस है ।”

पंडित शायद समझ नहीं पाया । उसने मुस्कुरा कर मेरी ओर देखा और कहा-“ कल हिंदी का श्राद्ध है? मैं भी श्राद्ध के समय यूँही व्यस्त रहता हूँ ।”

मैंने पत्नी को अभी तक यह बात नहीं बताई । नहीं तो शायद वह पंडित के साथ -साथ मेरा भी श्राद्ध मना देती ।

 

©डॉ. दलजीत कौर, चंडीगढ़                                                             

 

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