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लगातार स्क्रीनिंग से ही रुकेगी डाइबिटीज-टीबी

नरजिस हुसैन
नई दिल्ली। फातिमा ने एक महीने पहले दुनिया को अलविदा कह दिया। दिल्ली के गांधी नगर में अपने भरे-पूरे परिवार के साथ रहने वाली फातिमा पिछले 20 सालों से डायबिटीज की मरीज थी लेकिन, कुछ सालों से उन्हें अक्सर खांसी-नजला और लंबे वक्त तक बुखार की शिकायत रहने लगी थी। इसके अलावा वजन भी लगातार घटता जा रहा था। 67 साल तक पहुंचते-पहुंचते उनका चलना-फिरना भी बंद हो गया था। उनकी बेटी से बात कर पता चला कि उनका डॉक्टर खांसी-नजले की जो भी दवा देता था वह उन्हें खिला दी जाती थी लेकिन, कभी डॉक्टर ने टीबी जांच करने को नही कहा। हालांकि, डाइबिटिक फातिमा को टीबी के भी पूरे लक्षण थे लेकिन, टीबी जांच की गैर-मौजूदगी में यह यकीन से कहना मुश्किल है।

डाइबिटीज तीन गुना बढ़ाती है टीबी का खतरा
फातिमा की बेटी से करीब डेढ़ घंटे बात करने के बाद इस बात का अंदाजा लगा कि ऐसे कितने ही लोग दिल्ली और पूरे देश में होंगे जो डाइबिटिक हैं और इसके बाद उन्हें टीबी हुआ हो जिसका उन्हें पता ही नही चला। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनिया में 15 प्रतिशत टीबी के मरीजों में डाइबिटीज होता है जोकि एक अतिरिक्त बोझ है। कुछ अध्ययनों में भी यह कहा गया है कि डाइबिटीज टीबी के खतरे को दोगुना कर देता है। विश्व टीबी रिपोर्ट 2020 में भी यह बात साफतौर से कही गई है कि भारत में टीबी के कुल मामलों में 20 फीसदी मामले डाइबिटिज और टीबी के होते हैं। 2019 में रिवाइज्ड नेशनल टीबी कंट्रोल प्रोग्राम के तहत देश में टीबी के कुल नोटिफाइड मामलों में 64 प्रतिशत मामले हाई बल्ड शुगर के थे हालांकि, 8 फीसद मामले ही डाइबिटीज के दर्ज हुए जोकि 2018 की तुलना में एक फीसद ज्यादा थे।
नेशनल सेंटर फॉर बॉयोटेक्नोलॉजी इंफॉरमेशन (NCBI) में Prevalence of Diabetes and Pre-Diabetes and Associated Risk Factors among Tuberculosis Patients in India नाम से छपे एक अध्ययन में बताया गया है कि डाइबिटीज टीबी के खतरे को तीन गुना बढ़ा देता है। भारत में टीबी के मरीज सबसे ज्यादा है और इनके डाइबिटिक होने का खतरा लगातार रहता है। डाइबिटीज होने पर टीबी की बीमारी का इलाज मुश्किल हो जाता है और टीबी का इलाज करने पर डाइबिटिक लोगों के बल्ड शुगर को कंट्रोल करना भी खासा मुसीबतों भरा होता है। पूरी दुनिया में डाइबिटीज और टीबी के मामले चुनौतियों भरे है। दुनिया की करीब एक-तिहाई आबादी को टीबी है। अध्ययन बताता है कि दुनिया में टीबी के 95 फीसद मरीज कम आय वाले देशों में रहते हैं और इन्हीं देशों में 70 प्रतिशत के करीब वे लोग भी रहते हैं जो डाइबिटिक हैं। ये देश दक्षिण पूर्व एशियाई देश हैं।

डाइबिटीज और टीबी दो धार वाली तलवार
दिल्ली के पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन से जुड़ी डॉक्टर रूपा शिवशंकर के Quality of diabetes care in low- and middle-income Asian and Middle Eastern countries (1993-2012): 20-year systematic review नाम के अध्ययन में टीबी और डाइबिटीज से जुड़े तीन मुद्दों पर खास जोर दिया गया है। पहला, डाइबिटीज के मरीज की इम्युनिटी कम होती है तो उसको टीबी होने का खतरा बढ़ जाता है। दूसरा, डाइबिटिक इंसान के शरीर में टीबी को पहचान पाना मुश्किल होता है और तीसरा, इन दोनों वजहों से इलाज होने में काफी दिक्कतें आती है। टीबी और डाइबिटीज दो धार वाली तलवार की तरह हैं। टीबी के संक्रमण में शरीर में जिस तरह से ग्लुकोज इन्टॉलरेंस होता है उससे डाइबिटीज का खतरा बढ़ जाता है क्योंकि टीबी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली टेबलेट रिफामप्सिन रोगी के शरीर में ग्लूकोज के स्तर को स्थिर होने में मुश्किल पैदा करती है। यह पेपर 2014 में Diabetes Metabolism Research and Reviews में छपा था।
पूरी दुनिया में टीबी के सबसे ज्यादा मरीज भारत में हैं और डाइबिटीज के मरीजों में देश दूसरे नंबर पर आता है। टीबी-डाइबिटीज के मरीजों का इलाज एंटी-टीबी उपचार ही है जो सबके लिए होता है और जिसे बहुत नियम से मरीज को मानना होता है। हालांकि, टीबी-डाइबिटीज मरीजो की सही तादाद बता पाना मुश्किल है लेकिन, ”दक्षिणी भारतीय राज्य तमिलनाडु के अलग-अलग जिलों में करीब 23-26 प्रतिशत टीबी मरीजों को डाइबिटीज है लेकिन, अगर पूरे भारत की बात की जाए तो ऐसे करीब 25 फीसद मरीज है जिनको टीबी है और उसे बाद उन्हें डाइबिटीज हुई।” यह कहना है स्टैंले मेडिकल कॉलेज के टीबी और रेस्पीरेटरी विभागाध्यक्ष और प्रोफेसर डॉक्टर आर. श्रीधर का। डॉक्टर श्रीधर तमिलनाडु के थम्बरम सैनेटोरियम के सुपरिंटेंडेंट भी है। यह पूछने पर कि ऐसे कितने मरीजे हैं जिन्हें टीबी और डाइबिटीज दोनों है लेकिन उन्हें डाइबिटीज पहले ही होती है और उसके बाद टीबी होता है इसके जवाब में उन्होंने बताया,” टीबी-डाइबिटीज कांबिनेशन के करीब दो-तिहाई मरीजों को डाइबिटीज पहले होता है। ”

दक्षिण राज्य बनाम उत्तर भारतीय राज्य
अमूमन यह देखा गया है कि डाइबिटीज के ज्यादातर मामले दक्षिण भारतीय राज्यों में दर्ज किए जे हैं हालांकि, ऐसा नहीं है कि उत्तर भारतीय राज्य इससे अछूते हैं लेकिन, तुलना अगर की जाए तो बिल्कुल दक्षिण भारतीय राज्य आगे हैं। वैसे टीबी के लिए गरीबी को ही जिम्मेदार माना जाता रहा है और जो सही भी है लेकिन, कुछ साल पहले इसमें कई और कारणों ने भी अपनी जगह बनाई है जिसमें कुछ खास है- दक्षिण भारतीय राज्यों में कार्बोहाइड्रेट (चावल) से भरपूर खाना, मिठाइयों और मीठी चीजों का ज्यादा इस्तेमाल, मोटापा और जेनिटिक प्रडिस्पोजिशन जो दक्षिण भारत में रहने वाले लोगों में उत्तर भारत के मुकाबले आम है और खासा ज्यादा है। अब ज्यादा कार्बोहाइड्रेट खाना खाने और कम मेहनतकश यानी आराम की जिंदगी जीने से किसी भी इंसान को मोटापा जल्दी आता है और यही मोटापा अपने साथ लाता है डाइबिटीज और फिर यही डाइबिटीज इंसान को आगे चलकर मरीज बनाती है टीबी का। यानी ये सारी चीजें आपस में जुड़ी हुई हैं और इसका इलाज खुद हमारे हाथ में है।
डॉक्टर श्रीधर का कहना है, ”डाइबिटिक के टीबी होने में उम्र भी मायने रखती है। अगर टीबी के मरीज की उम्र 40-60 साल की हो तो उसकी डाइबिटक होने की संभावना 3.5 प्रतिशत बढ़ जाती है। तो डाइबिटिक के टीबी होने में उम्र का यह मेल 40-60 और 60 से ऊपर की उम्र को लोगों में ज्यादा तेजी से होता है।” डॉक्टर श्रीधर ने इस बात पर जोर दिया कि कोई भी बीमारी अगर पहले हो यानी अगर टीबी है तो फौरन डाइबिटीज और एचआईवी की जांच जरूरी है, अगर डाइबिटीज है टीबी की जांच जरूरी है और अगर एचआईवी है तो टीबी और डाइबिटीज की जांच बेहद जरूरी है और यह सरकार के नॉन-कम्युनिकेबल डिसीज को खत्म करने के एंजेडे में भी सबसे पहले आता है। उन्होंने बताया कि जरूरत इस बात की है कि इन तीनों जानलेवा बीमारियों की जल्द से जल्द जांच को लेकर आम जनता में जागरुकता फैलाई और बढ़ाई जाए क्योंकि सही समय पर जांच ही इन बीमारियों के इलाज और उनकी रोकथाम में मददगार होगी। इसके अलावा हमें चाहिए कि मरीजों को अन्य बीमारियों से जुड़े लक्षणों के बारे में जानकारी दे।

बहुत काम है बाकी
सही वक्त पर जांच और जानकारी वाली बात तो ठीक है लेकिन, इसके बाद अगर मरीज को मल्टी ड्रग रेस्सिटेंस हो या फिर वो दवा को डॉक्टर के बताए तरीके के मुताबिक नहीं ले रहा है तो भी बीमारी के इलाज में मुश्किले पैदा होती है जो जानलेवा तक साबित हो सकती है। डाइबिटीज-टीबी के मरीजों को चाहिए कि शरीर में बल्ड शुगर का स्तर बनाए रखे और दवाएं ठीक तरीक से ले रहें। ये बात सही है कि अगर टीबी उपचार की दवाओं को अगर ठीक तरीके से नही लिया जाता तो इलाज का वक्त लंबा खिंच सकता है और मरीज को मल्टी-ड्रग रेस्सिटेंस भी हो सकता है। तो यहां यह बात तो साफ हो गई कि डाइबिटीज होने से टीबी होने का खतरा लगातार बना रहता है और दवाइयों के साथ लापरवाही न सिर्फ टीबी के इलाज में मुश्किलें पैदा करती है बल्कि जानलेवा भी होती है। यही नहीं इस लापरवाही से अक्सर ठीक हो चुका टीबी वापस लौट भी आता है। आर. मीना, एन. जैन, एम. शर्मा और आर. औरंगाबादवाला ने 2011 में इस मुद्दे पर अध्ययन किया जो Factors responsible for relapse under revised national tuberculosis control programme (RNTCP) से 21st Annual Congress of the European Respiratory Society: Amsterdam, The Netherlands. 24–28 September 2011 में प्रस्तुत किया गया और जिसमें यह बताया गया कि किस तरह डाइबिटीज टीबी के दोबारा होने की कई वजहों में से एक खास वजह है। कुछ इसी तरह के नतीजे चीन में टीबी के मरीजों पर हुए एक अध्ययन में भी सामने आए।
डाइबिटीज और टीबी दो ऐसी बीमारियां है जो हमारे देश में दो अलग-अलग कार्यक्रमों के तहत कवर की जाती है पहला, National Programme for Prevention and Control of Cancer, Diabetes, Cardiovascular Diseases, and Stroke (NPCDCS), और दूसरा, Revised National Tuberculosis Control Programme (RNTCP)। हालांकि, जरूरत इस बात की है कि सरकार इन दोनों कार्यक्रमों को मिलाकर इन दोनों ही बीमारियों को काबू करे। 2017 से सरकार ने टीबी-डाइबिटीज का साझा कार्यक्रम (National Framework for joint TB-Diabetes Coaborative Activities) भी शुरू किया है लेकिन, इसके अलावा, विश्व स्तर पर इन बीमारियों की रोकथाम के लिए जो योजनाएं दुनिया की अलग-अलग सरकारों ने चलाई है उनके साथ भी हाथ बंटाना जरूरी है। जरूरत इस बात की भी है कि राष्ट्रीय टीबी रोकथाम कार्यक्रम के तहत देशभर में लैबोरेटरी और डाइग्नोस्टिक सुविधाओं को फैलाया जाए ताकि पूरा देश इसमें कवर हो सके। इसमें प्राइवेट सेक्टर को भी शामिल कर सरकार को उनकी जिम्मेदारी और जवाबदेही भी तय करनी होगी तभी टीबी को आने वाले कुछ और सालों में जड़ से खत्म किया जा सकेगा।

लेखिका दिल्ली में स्वतंत्र पत्रकार हैं

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