इकोनॉमी

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और बढ़ती ऊर्जा कीमतों के बीच भारत पर असर शुरू, घटा GDP अनुमान

अर्थशास्त्री रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष ऊर्जा बाजार को झकझोर रहा है। तेल और गैस की कीमतों में बढ़ोतरी का असर धीरे-धीरे एशिया की अर्थव्यवस्थाओं पर दिखने लगा है। रिपोर्ट के मुताबिक यही वजह है कि वित्त वर्ष 2027 के लिए भारत का चालू खाते का घाटा (CAD) बढ़कर GDP का 1.6 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। वहीं महंगाई का अनुमान भी बढ़ाकर 4.5 प्रतिशत कर दिया गया है, जो पहले 3.8 प्रतिशत रहने का अनुमान था।

पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध और ऊर्जा संकट की आंच अब भारत की अर्थव्यवस्था तक पहुंचती दिख रही है। ब्रोकरेज फर्म ने चेतावनी दी है कि अगर यह तनाव लंबा चलता है तो भारत की मजबूत आर्थिक रफ्तार पर असर पड़ सकता है। इसी आशंका के बीच नोमुरा ने वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) के लिए भारत की जीडीपी वृद्धि दर का अनुमान हल्का घटाकर 7.1 प्रतिशत से 7 प्रतिशत कर दिया है।

2026 की पहली तिमाही के शुरुआती संकेत बताते हैं कि देश में खपत और औद्योगिक गतिविधियां अभी मजबूत बनी हुई हैं। लेकिन दूसरी तरफ निर्यात और सरकारी खर्च में कमजोरी दिख रही है। सबसे बड़ी चिंता ऊर्जा सप्लाई को लेकर है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण प्राकृतिक गैस की कमी की आशंका बढ़ रही है, जिससे भारत में उद्योगों और सेवा क्षेत्र की गतिविधियों पर असर पड़ सकता है।

युद्ध के असर अब आम लोगों तक पहुंचने लगे हैं। सरकार पहले ही एलपीजी की कीमतें बढ़ा चुकी है, और आगे भी ईंधन से जुड़ी कई सेवाओं के महंगे होने की आशंका जताई जा रही है। नोमुरा के अनुसार आने वाले समय में एलपीजी, हवाई और सड़क परिवहन, होटल और रेस्तरां सेवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिसका सीधा असर महंगाई पर पड़ेगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर कच्चे तेल की कीमतों का पूरा असर पेट्रोल और डीजल पर डाला गया, तो तेल की कीमत में हर 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी महंगाई को लगभग 0.5 प्रतिशत तक बढ़ा सकती है।

ऊर्जा संकट के खतरे को देखते हुए भारत सरकार भी सक्रिय हो गई है। सरकार ने कहा है कि भारत को जल्द ही कच्चे तेल और एलएनजी के दो-दो कार्गो मिलेंगे, जो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते बंद होने के कारण दूसरे मार्ग से भेजे गए हैं। इसके अलावा देश की तेल कंपनियों ने संभावित कमी से निपटने के लिए अपनी रिफाइनरियों में एलपीजी उत्पादन करीब 25 प्रतिशत तक बढ़ा दिया है।

पश्चिम एशिया के युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में भी उथल-पुथल मचा दी है। स्थिति को संभालने के लिए अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने इतिहास का सबसे बड़ा कदम उठाते हुए 400 मिलियन बैरल तेल आपातकालीन भंडार से जारी करने का फैसला किया है। इसके बावजूद तेल आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है।

रिपोर्ट्स के अनुसार इराक को स्टोरेज की कमी के कारण करीब 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन उत्पादन बंद करना पड़ा है, जबकि कुवैत ने भी कुछ उत्पादन घटा दिया है। इराक के दक्षिणी तेल क्षेत्रों में उत्पादन 3.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन से गिरकर लगभग 1.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी बड़ी मात्रा में उत्पादन बंद होने के बाद इसे फिर से शुरू करना आसान नहीं होगा और इसमें कई हफ्ते लग सकते हैं।

विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर संकट जल्द नहीं थमा तो तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं। रैबोबैंक के अनुमान के अनुसार 2026 की दूसरी तिमाही में ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत करीब 90 डॉलर प्रति बैरल रह सकती है। इसके बाद तीसरी तिमाही में 86 डॉलर और चौथी तिमाही में 82 डॉलर के आसपास रहने का अनुमान है।

विश्लेषकों का कहना है कि युद्ध की यह आग अगर लंबी चली, तो इसका असर सिर्फ तेल बाजार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ-साथ भारत की वृद्धि दर और महंगाई पर भी गहरा असर डाल सकता है।

 

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