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राम का नाम यूं बदनाम ना करो ….

भारतवर्ष के धार्मिक हलकों में एक वर्ष से भी अधिक समय से चल रही सुगबुगाहट अब विस्फोटक का रूप ले रही है। अयोध्या के राम मंदिर पर आए सुप्रीम फैसले के साथ ही राम मंदिर निर्माण का कार्य संभालने की राजनीतिक होड़ शुरू हो गई। मंदिर निर्माण की प्रक्रिया में जो पद्धति अपनाई गई उससे देशभर के धर्माचार्यों की तनी हुई भवें क्रोध से अभी भी फड़क रही हैं। गलत मुहूर्त में भूमि पूजन, ट्रस्ट में धर्माचार्यों के स्थान पर छद्मवेशियों को स्थान देना, वैदिक उपासना और कर्मकांड पद्धति को हटाकर मनमाने ढंग से भूमि पूजन, राम मंदिर का विवादास्पद लोगो और साथ ही अब संदेहास्पद नींव भराई-  इन सब का विरोध धर्माचार्य लगातार कर ही रहे थे कि बीच-बीच में कुछ भड़काऊ एवं अमर्यादित राजनैतिक बयानों ने आग में घी डालने का कार्य कर दिया। निधि समर्पण अभियान के नाम पर नकली रसीदें छपवाकर चौथ वसूली तक का तमाशा पूरे भारत की जनता ने यत्र तत्र देखा।

ऐसे में सैकड़ों वर्षों से प्रतीक्षारत राम मंदिर निर्माण की दिव्य अनुभूति को ठेस लगनी स्वाभाविक थी। वैसे भी प्रभु श्रीराम के मर्यादित और धार्मिक व्यक्तित्व के साथ उपर्युक्त सभी व्यवहार मेल नहीं खाते। राम मंदिर निर्माण के दिव्य स्वप्न को संजोए बैठी हिन्दुस्तान की जनता को और बड़ा धक्का तब पहुंचा जब मंदिर के लिए खरीदी गई जमीन में करोड़ों के घोटालों के साक्ष्य सर्वजनिक हो गए।

ज्योतिष एवं द्वारका शारदा पीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती मंदिर निर्माण की प्रक्रिया पर समय-समय पर न केवल प्रश्न उठाते रहे हैं बल्कि शास्त्रीय विधि के विरोध में सुदृढ़ तर्क भी रखते रहे हैं। ऐसे में मंदिर भूमि खरीद घोटाले के सामने आने के बाद उनके तेवर और तीखे होना स्वाभाविक है। आखिर हो भी क्यों ना? सन् 1983 में चित्रकूट में शंखनाद रैली करके उन्होंने ही ‘राम जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति’ के माध्यम से इस पुनीत कार्य का बीड़ा उठाया था किंतु 90 के दशक से राजनीतिक लाभ उठाने के उद्देश्य से आंदोलन की दशा और दिशा कुछ लोगों ने बदल दी। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद बार-बार कहते रहे कि वहां बाबरी मस्जिद कभी थी ही नहीं। वे स्वयं इसके गवाह भी हैं। उन्होंने इस संदर्भ में समय-समय पर न्यायालय में साक्ष्य भी प्रस्तुत किए।

बहुत से लोग जो आज राम मंदिर निर्माण में ‘लहू लगाकर शहीदों में मिलने’ की कहावत चरितार्थ कर रहे हैं, वे वहां मंदिर के स्थान पर स्मारक बनाना चाहते हैं। इस पर जमीन खरीद घोटाले के खुल जाने से जनता की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ का पूरा चिट्ठा जनता के सामने खुल गया है। अब जनता को समझ में आ रहा है कि जिस तरह जोशीले नारों से गलत को सही सिद्ध नहीं किया जा सकता है वैसे ही सभी भगवाधारियों को सनातन धर्म का रक्षक नहीं कहा जा सकता। हां, दोनों ही प्रक्रियाएं फैशन का एक अंग कहीं जा सकती हैं। जहां तक जमीन खरीद घोटाले का प्रश्न है तो इस संदर्भ में दो-दो रुपये वाले समर्थक भी ढेरों हास्यास्पद तर्क रख रहे हैं, जो इस चिलचिलाती गर्मी में भी लोगों के चेहरे पर मुस्कान ला रहे हैं।

देशभर के सनातन धर्मियों के लिए देखा जाए तो यह समय हर्ष का है क्योंकि राम मंदिर निर्माण में सामने आ रहे नए नाटक सिद्ध कर रहे हैं कि सनातन धर्म के पारंपरिक धर्माचार्य ही सही हैं। वैसे भी इन धर्माचार्यों को न तो राम मंदिर से वोट चाहिए न ही नोट, उनके लिए राम मंदिर आस्था का विषय है। लेकिन राम मंदिर निर्माण के नाम पर चल रहे इन सब नाटकों से शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद की चेतावनी सही ही साबित हो रही हैं। वैसे भी यह तो सभी रामभक्त जानते ही हैं कि वानर सेना में वानरों का रुप धरकर बहुत से मायावी राक्षस आ मिले थे।

तिस पर सूचना आ रही है कि शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद के आंदोलन प्रिय शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अयोध्या में बार- बार भ्रमण कर रहे हैं। इतना ही नहीं जब उन्होंने राम जन्मभूमि निर्माण स्थल की फोटो खींचना चाही तो उन्हें रोक दिया गया। यही कारण है कि शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद और उनके शिष्यों के साथ अन्य धर्माचार्य भी ‘राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ को भंग करने की बात कर रहे हैं। संतों को खुदाई स्थल की फोटो खींचने से रोकना बता रहा है कि सचमुच दाल में कुछ तो काला अवश्य है।

 

©डॉ. दीपिका उपाध्याय, आगरा                  

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