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उलझन…

लिखो तुम और मै पढूं

सिखाओ तुम , मै सीख जाऊं

….सबक

जिंदगी का

 

उलझनों को मेरी

सिर्फ तुम

सुलझा सकते हो।

 

शब्दों का

सुनहरा जाल बुनकर

नामों को रंगीन बना सकते हो

क्योकि

शब्दों की जादूगरी

आती है

खूब आप को

मेरे सवालों के

जवाब दिये बिना

सारी दुविधा मिटा सकते हो।

सुनो!

दर्द मे मेरे

अपनी मुस्कान का

मरहम लगाओ।

दिल की किताब खोलकर

जिन्दगी के पन्ने पढाओ, हर्फ समझाओ ।

 

© आकांक्षा रूपा चचरा, कटक, ओडिसा

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