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अदब व तहजीब की कला : मुजरा

भारत में मुजरे का अपना इतिहास रहा है।एक समय था मनोरंजन के क्षेत्र में यह कला शीर्ष पर थी। उस दौर में मुजरा कलाकारों को सुसंस्कृत और उच्च तहजीब का माना जाता था।  सदियों से नाच गाना हमारी भारतीय सभ्यता व संस्कृति का हिस्सा रहा है। मौर्य साम्राज्य और हड़प्पा सभ्यता के दिनों में नगरसेविकाओं को समाज में उच्च दर्जा हासिल था। उन्हें राजाश्रय मिलता था। इतना ही नहीं पहले अप्सराएं नाचती थी। मंदिर में नर्तकियां नाचती थी। राजाओं को प्रसन्न करने के लिए राजनर्तकियां। उत्तर भारत के राजदरबारियों का कथक, हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत और गजल से मनोरंजन करना होता था।

मुजरों की शुरूआत मुगल काल से हुई थी,  मुगल बादशाहों के हरम में नाचने गाने वालियां उनके मनोरंजन के लिए मुजरा का मुजाहरा करती थीं, मुजरे में नाच के साथ – साथ गायन भी होता था, तबले की थाप , हारमोनियम के सुर , गाने के बोल के साथ घूंघरू की आवाज अजब समां उपस्थित करते थे।

मुजरा  का शाब्दिक अर्थ फारसी भाषा में सलाम व सम्मान होता है।कत्थक सरीखे शास्त्रीय नृत्य-गीतों में रचा-बसा नृत्य  मुजरा है। यह अपने आप में एक अदब व तहजीब है। आगे चलकर इसे संगीत में तब्दील कर दिया गया। मुगल शासन काल में दरबार में महिलाओं के द्वारा गीत-संगीत के साथ मुजरा प्रस्तुत करना प्रथा हो गया।

16वीं से 19वीं शताब्दी के बीच मुजरा सौन्दर्य और संस्कृति का प्रतीक माना जाता था। मनोरंजन का यह साधन केवल राजा-नवाबों के लिए ही था। इसमें सादगी और सालीनता मुनासिब थी। जयपुर कत्थक नृत्य का प्रसिद्ध केंद्र रहा है। कत्थक नृत्य की दो ही शैलियाँ मानी जाती हैैं-  जयपुर और लखनऊ। यही वजह रही कि मुजरा भी जयपुर और लखनऊ में ही ज़्यादा परवान चढ़ा। तवायफों में एक तबका देवदासियों सरीखा होता था। मंदिरों में नृत्य गायन से सम्बद्ध होने के कारण इन्हें ‘भगतण’ कहा जाता था। समाज में इनको आदर की दृष्टि से देखा जाता था। मुजरा ठुमरी और गज़ल गायकी से सम्बद्ध होने के कारण शास्त्रीय नृत्य कत्थक पर आधारित होता था। मुजरा परम्परागत रूप से महिफलों की प्रस्तुति होती थी। इन्हें कोठा भी कहा जाता था। घरानों से जुड़ा हुआ मुजरा बेटी को माँ की विरासत के साथ पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता था। इन घरानेदार तवायफों को कुलीन वर्ग में विशेष सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। इन्हें कला और संस्कृति का विशेषज्ञ माना जाता था। मुजरेवालियों में डेरेदारनियाँ बहुत ऊँचे दर्जे की तवायफें मानी जाती थीं। डेरेदारनियाँ किसी एक की पाबन्द होकर रहती थीं। जिसकी हो गईं उसके लिए और उसके दोस्तों के दिल बहलाव के लिए नाचती-गाती थीं। तहज़ीब, सलीकामंदी और शे’रो-शायरी में उनका कोई सानी नहीं होता था। इनके कोठे और हवेलियाँ शिष्टाचार और कला के केंद्र माने जाते थे।

मुगलकालीन बादशाह शहजादों को तहजीब व अदब की तालीम देने के लिए तवायफों की कोठी पर पहुंचाते थे। मुजरे की यह परंपरा सन् 1616 में मुगल सम्राट जहांगीर के समय शुरू हुई थी। उस समय सम्राट के मनोरंजन के लिए पारंपरिक वाद्य यंत्रों पर संगीतमयी मुजरा होता था। सम्मानित घरों के रजवाड़े खानदान के बच्चों को भाषा की उच्च शैली सिखाने के लिए मुजरे वालों के पास भेजा जाता था।

उस जमाने में तवायफें काफी तहजीब वाली होती थीं। उनसे लोग आदाब, सलाम, रहन-सहन और बोल-चाल के तौर-तरीके सीखने जाते थे। ताल्लुकेदार अपने लड़कों को मुलाजिम के साथ यह तहजीब सीखने भेजा करते थे। नवाबों के जमाने में घर की महिलाएं या लोग नाच नहीं करते थे। तब तहजीब, अदब और पर्दा काफी होता था। घर में शादी-ब्याह में तवायफें बुलाईं जाती थीं। वह भी सिर्फ अमीर लोग ही बुला पाते थे। तवायफों को शादी के न्यौते में अशरफियां भेजी जाती थीं।

1945 के बाद पेशेवर शास्त्रीय गायक गायिकाओं के उदय के बाद भले ही बाइयां और तवायफें गुमनामी के अंधेरे में खो गयी हों, किन्तु बसंत बहार, बैजू बावरा और चित्रलेखा जैसी फिल्मों के उत्कृष्ट संगीत तक पहुंचने में इन बाइयों और तवायफों की गायिकी का अहम रोल रहा है।

तवायफ ,कोठा और मुजरा जैसे शब्द लोग हिकारत के साथ ही बोलते हैं। साथ ही फिल्मों में भी तवायफें को अक्सर तरस खाने की चीज दिखाई जाती है जबकि बालीवुड की पहली ,अदाकारा,गायिकाएं, निर्देशिकाएं और निर्माता ये तवायफें रही हैं।  “प्रसिद्ध अभिनेत्री नर्गिस की मां जद्दनबाई न सिर्फ कुशल गायिका थीं बल्कि उन्होंने अपनी निर्मित फिल्म ‘ तलाश – ए – हक ‘(1935) में संगीत देकर फिल्म जगत की पहली महिला संगीतकार होने का गौरव भी प्राप्त किया। ‘तलाश – ए – हक ‘ में उनकी छोटी बच्ची नर्गिस ने बेबी रानी के नाम से अपनी पहली फिल्मी भूमिका निभाई थी और उन पर  ‘ प्यारे अब्बा , तुम्हें अब पाऊं कहां ‘ गीत भी फिल्माया गया था। ‘तलाश – ए – हक ‘ में जद्दनबाई ने स्वयं भी अपनी ठेठ शास्त्रीय मिश्रित कोठे की शैली में ‘ घोर घोर घोर घोर बरसत मिहरवा ‘, ‘ दिल में जब से किसी का ठिकाना हुआ ‘ जैसे कुछ गीत अपने पर फिल्माए थे।”( धुनों की यात्रा – पंकज राग ‘ पृ : 12)जद्दनबाई के अलावा ” बेगम अख्तर ने ‘ जवानी का नशा ‘ फिल्म में नायिका का रोल किया था और ‘ याद में तेरी जहां को भूलता जाता ‘ जैसी ग़ज़ल और  ‘ कोयलिया मत कर पुकार ‘ जैसी ठुमरी शैली की रचनाएं गाई थी। ”

( धुनों की यात्रा, पंकज राग, पृ – 35)

सच तो यह है कि कोठेवाली से ‘गायिका ‘ के रूप में स्वयं को स्थापित करने के लिए इन्होंने एक लंबा सफर तय किया। कोठों पर जिस विधा को इन्होंने सजाया, संवारा , साथ ही इस विधा के सम्पूर्ण विकास में अपना योगदान दिया और  न  केवल अपनी अनूठी प्रस्तुति से संगीत रसिकों का मनोरंजन किया बल्कि आगे आने वाली पीढ़ी की , संभ्रांत घरों की गायिकाओं को भी इसके लिए प्रयास का मार्ग दिखाया।

 

©डॉ. विभा सिंह, दिल्ली                                                    

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