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मेरा शहर ….

संस्मरण भाग- १

आमतौर पर हर व्यक्ति को अपने देश अपने प्रांत, अपने शहर, अपने गांव पर गर्व होता है, इसी तरह मुझे भी अपने शहर बिजनौर पर गर्व है। बिजनौर के गौरव का प्रतीक है देवनदी गंगा के किनारे स्थित विदुर कुटी। महाभारत के युद्ध से पहले कृष्ण के चरण बिजनौर की धरती पर पड़े तो बिजनौर शहर की जमीन पावन हो गई। स्वयं भगवान कृष्ण ने दुर्योधन के ५६ भोगों को ठुकरा कर महात्मा विदुर की कुटी में जाकर बथुए के साग को ग्रहण किया था। सूरदास जी की दृष्टि में  : – सबसे ऊंची प्रेम सगाई, दुर्योधन की मेवा त्यागी, साग विदुर घर खाई।

इसकी कल्पना करते ही हृदय आनंद से भर जाता है, वहां की धरती पर फैला हुआ बथुआ इस बात का साक्षी है जो पूरे वर्ष हरा भरा रहता है। बिजनौर में चांदपुर रोड पर स्थित विदुर कुटी महात्मा विदुर की तपस्थली है। गंगा के किनारे बनी विदुर कुटी का वातावरण अलौकिक तथा नैसर्गिक शांति देता है। शास्त्रों के अनुसार कौरवों और पांडवों के बीच कलह से  क्षुभित होकर महात्मा विदुर हस्तिनापुर से गंगा पार करके दारा नगर गंज आए थे, फिर समीप ही कुटी बना कर रहने लगे थे।

महाभारत युद्ध से पहले कृष्ण जब संधि प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर आए किन्तु संधि प्रस्ताव असफल हो गया था कृष्ण ने दुर्योधन के भोजन के प्रस्ताव के साथ साथ कौरवों की ५६ भोगों को भी अस्वीकार कर दिया था। भक्तवत्सल भगवान ने विदुर के आश्रम में आकर  बथुआ के साग का भोजन ग्रहण किया था। सन् १९५९ में  बिजनौर के कुछ सेवानिवृत्त गणमान्य लोगों ने दारानगर गंज के पास  वानप्रस्थ आश्रम बनाने का निश्चय किया, जिसका क्रियान्वयन १९६० में हुआ था।

भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के करकमलों द्वारा विदुर की मूर्ति का शिलान्यास हुआ। इस अवसर पर सम्मिलित होने का सौभाग्य मुझे भी प्राप्त हुआ था। अपने कॉलेज की तरफ से हम चार लड़कियों का चयन किया गया था। इस अवसर पर एक लघु संगीत कार्यक्रम का भी आयोजन हुआ था , समूह में रामधुन का गायन हुआ फिर उसके बाद मेरी भजन प्रस्तुति हुई थी। ये सोच कर मैं आज भी अभिभूत हो जाती हूं।

 

©मधुश्री, मुंबई, महाराष्ट्र                                                 

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