केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने साकेत सहाय की लिखी पुस्तक इलेक्ट्रानिक मीडिया को किया पुरस्कृत, पुरस्कार में मिले डेढ़ लाख नकद व स्मृति चिन्ह ….

नई दिल्ली।  देश के जाने-माने लेखक डॉ. साकेत सहाय, को उनकी प्रथम पुस्तक ‘इलेक्ट्रॉनिक मीडिया : भाषिक संस्कार एवं संस्कृति’ के लिए दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा वर्ष 2019 का ‘साहित्य श्री कृति सम्मान’ प्राप्त हुआ है। जिसके तहत उन्हें स्मृति चिन्ह, अंग वस्त्र एवं ₹१,५०,००० (१ लाख ५० हज़ार रुपए मात्र) प्रदान किए जाएँगे। विधिवत सम्मान समारोह कोरोना काल के बाद आयोजित किया जाएगा। लेखक ने इस पुरस्कार को माता-पिता, गुरूजनों, परिजनों, मित्रों, स्नेही जनों को समर्पित किया। लेखक भाषा-समाज एवं संस्कृति के प्रति समर्पित एवं प्रतिबद्ध लेखन प्रेम के लिए स्वयं के भीतर विद्यमान दृढ़-संकल्प का श्रेय अपने स्वर्गीय पिता को देते है। वे कहते हैं यह संकल्प शक्ति ही है कि पहले सैन्य सेवा और अब बैंकिंग सेवाओं में रहते हुए भी वे लेखन कर पाते हैं।

डॉ साकेत सहाय कहते हैं व्यक्ति की सफलता-असफलता में माता-पिता, गुरूजनों का बहुत बड़ा योगदान होता है और साहित्य लेखन तो समाज के सहयोग के बिना असंभव है। पत्रकारिता, मीडिया भी समाज से अलग हो नहीं सकता। जो पत्रकारिता समाज, भाषा, परम्परा एवं संस्कृति से अलग होकर कार्य करती है वह पत्रकारिता नहीं विज्ञापन कहलाती है। लेखक अपनी पुस्तक में मीडिया के तमाम सकारात्मक-नकारात्मक पक्षों को समझने की कोशिश करते है। पुस्तक में वे लिखते हैं देश, समाज व काल निर्माण में भाषा, संस्कृति एवं पत्रकारिता का घनिष्ठ सम्बंध रहा है पर आधुनिक मीडिया इस संबंध को कमजोर कर रहा है। आज यह माध्यम अपनी व्यापक प्रगति के कारण समाज के प्रत्येक पहलू को प्रभावित करने की स्थिति में है। कई बार संस्कृति एवं समाज निर्माण में इसकी भूमिका को लेकर प्रश्न भी उठते हैं। सूचना और संचार की एकरेखीय और एकतरफ़ा प्रवाह से समाज, भाषा एवं संस्कृति के लिए संक्रमण की स्थिति उत्पन्न हुई है। हमारी भाषा, संस्कृति, जीवन-शैली सब कुछ भयंकर बदलाव से गुज़र रहे है। इसमें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का बहुत बड़ा हाथ रहा है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए तब घातक स्थिति सिद्ध होती है जब संचार माध्यम जैसे महत्वपूर्ण अंग नैतिक मूल्यों को तिलांजलि देते हुए इसे एकमेव लाभ का अड्डा बनाए।

पुस्तक देवनागरी लिपि में सरल,सहज एवं स्वीकार्य हिंदी में इन बदलावों पर एक विमर्श प्रस्तुत करने का प्रयास करती है। समीक्षकों के अनुसार हिंदी में इस प्रकार की यह पहली पुस्तक है। बताते चले कि लेखक हिंदी में लेखन हेतु पूर्व में भी भारत के महामहिम राष्ट्रपति के कर-कमलों से राजभाषा गौरव पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं। साथ ही लेखक ने ‘भारत में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और हिंदी :१९९० के दशक के बाद – एक समीक्षात्मक अध्ययन’ जैसे नवोन्मेषी विषय पर अकादमिक क्षेत्र से दूर रहते हुए भी हिंदी जगत में सर्वप्रथम शोध-पत्र प्रस्तुत किया है। जिसकी सराहना अकादमिक क्षेत्र के साथ ही हिंदी प्रेमियों ने भी किया । लेखक के भाषाई प्रयोजनशीलता पर ५०० से ज़्यादा आलेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं एवं शोध पुस्तिकाओं में प्रकाशित हो चुके है। लेखक ११वें विश्व हिंदी सम्मेलन, मारीशस में हिंदी विश्व एवं भारतीय संस्कृति विषय पर शोध-पत्र प्रस्तुत कर चुके है। जिसकी सराहना तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज द्वारा की गई। लेखक देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में हिंदी की प्रयोजनशीलता को लेकर छात्रों को सम्बोधित कर चुके हैं। हाल ही में लेखक की पुस्तक ‘जन बैंकिंग-eबैंकिंग प्रकाशित हुई है। अपनी पुस्तक प्रकाशन की इस यात्रा में वे मीडिया क्षेत्र के लेखकों, पत्रकारों, विशेषज्ञों एवं समीक्षकों का आभार प्रकट करते है। इस कठिन समय में पुरस्कार की घोषणा हेतु लेखक दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड के अध्यक्ष डॉ राम शरण गौड़ एवं उनकी समस्त टीम, संस्कृति मंत्रालय के प्रति आभार व्यक्त करते है।

लेखक अपनी आगामी पुस्तक के बारे में बताते है कि उनकी आगामी पुस्तक देश की आज़ादी के अमृत वर्ष के पवित्र अवसर पर लोकार्पित होगी। पुस्तक देश के ऐसे महान शहीदों को समर्पित है जिन्होंने देश की स्वाधीनता की ख़ातिर अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। यह पुस्तक सामयिक लेखन के लिए चर्चित लेखिका संगीता सहाय के साथ संयुक्त रूप से बिहार राष्ट्रभाषा अकादमी के द्वारा प्रकाशित की जा रही है।

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