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नर्मदा परिक्रमा मार्ग का प्रमुख तीर्थ स्थल मंडलेश्वर जहां भगवान भोलेनाथ ने स्वयं स्थापित किए गुप्तेश्वर महादेव ….

नर्मदा परिक्रमा भाग -20

 अक्षय नामदेव। महेश्वर से हम शाम 4:00 बजे रवाना हुए और नर्मदा तट के प्रमुख तीर्थ मंडलेश्वर पहुंचे। मंडलेश्वर तीर्थ में पहुंच कर सबसे पहले हमने गुप्तेश्वर महादेव के प्राचीन मंदिर का दर्शन किया। गुप्तेश्वर महादेव जहां पर स्थापित है उस स्थान के बारे में मान्यता है कि इस शिवलिंग को स्वयं भोलेनाथ ने स्थापित किया है। अत्यंत छोटे गुफा नुमा मंदिर में विशाल शिवलिंग। वहां धूप दीप अर्पित करने के साथ रुद्राष्टक का पाठ किया।

गुप्तेश्वर महादेव मंदिर से निकलकर हम वही पेड़ के नीचे बैठ गए जहां स्थानीय कुछ धार्मिक व्यक्ति भी पहले से बैठे थे। उन्हीं में से एक सज्जन ने बताया कि मंडलेश्वर नगर की स्थापना मंडन मिश्र ने की थी जिन्हें शंकराचार्य ने शास्त्रार्थ में पराजित किया था। उन्होंने बताया कि मंडन मिश्र एक परम विद्वान था जिसने शंकराचार्य से शास्त्रार्थ किया था। मंडलेश्वर अत्यंत प्राचीन नगर है जहां होलकर शासकों का राज रहा। उन्होंने मंडलेश्वर के बारे में और भी बहुत सारी जानकारी दी। कहां रुकेंगे आप आज ? हमने कहा 5:00 तो बज ही रहे हैं यही मंडलेश्वर में ही रुकने का विचार है। उन्हीं में से एक व्यक्ति ने जानकारी दी कि मंडलेश्वर नर्मदा घाट पर दीदी डॉक्टर विजय लक्ष्मी साधो का नर्मदा आश्रय उचित रहेगा आप लोगों के रुकने के लिए। बिल्कुल नर्मदा घाट पर ही है।

गुप्तेश्वर महादेव का दर्शन करने के पश्चात हम नर्मदा घाट मंडलेश्वर चले गए। रास्ते में एक युवक से पूछा डॉक्टर साधो का आश्रम कहां पर है? वह कहा चलिए पहुंचा देता हूं। कहकर वह हमें डॉक्टर विजयलक्ष्मी साधो के नर्मदा तट स्थित आश्रय स्थल तक पहुंचा दिया।

शाम लगभग 5:45 बजे हम डॉक्टर विजय लक्ष्मी साधो के नर्मदा आश्रय स्थल के सामने थे। आश्रम के सामने दलान में कुर्सियां डाल कर एक धर्म निष्ठ दंपत्ति बैठे थे जिनके चेहरे मोहरे में ही आध्यात्मिक भाव झलक रहा था। मैं और तिवारी उतर कर उनके पास गये तथा उन्हें नर्मदे हर कह कर उनका अभिवादन किया। उन्होंने नर्मदे हर का हमारा अभिवादन स्वीकार किया। हमने वहां रात्रि विश्राम की मंशा जताई तो उन्होंने कहा आराम से रुकिये यहां। तब तक हम खाली कुर्सियों में बैठ चुके थे। आपस में परिचय हुआ तो उन्होंने बताया कि हम भी परिक्रमा वासी हैं। अरे हमने तो आपको आश्रम का केयरटेकर समझ लिया था मैंने संकोच से कहा । कोई बात नहीं। आप हमें अपना केयरटेकर ही समझे। मैंने जब उनसे उनके निवास स्थान इत्यादि के बारे में जानकारी ली तो उन्होंने बताया कि वे होशंगाबाद के रहने वाले हैं उनका नाम हरीश जोशी है तथा उनकी पत्नी रीता जोशी उनके साथ ही परिक्रमा में है। उनके बड़े भाई उमेश जोशी एवं रमा जोशी भी परिक्रमा पर है जो 10 किलोमीटर पीछे घाट पर रुके हुए हैं।मैं श्रद्धा से भर कर दंपत्ति को दीदी एवं भैया से संबोधित किया तो वे बड़े प्रसन्न हुए। दीदी अंदर जाकर हम लोगों के लिए चाय बना कर ले आई। हमने उनके साथ चाय पी । चाय पीने के बाद जोशी भैया ने कहा आप सामने नर्मदा घाट में स्नान पूजन करके आ जाइए फिर हम सब एक साथ भोजन करेंगे

डॉक्टर विजय लक्ष्मी साधो द्वारा नर्मदा परिक्रमा वासियों के सेवार्थ स्थापित आश्रय स्थल के सामने बने दलान में मां नर्मदा की सुंदर प्रतिमा स्थापित है। आश्रम दो मंजिला हाल है जिसमें नीचे रसोई एवं भोजन कक्ष है। हाल के किनारे ही प्रसाधन इत्यादि बने हुए हैं। ऊपर मंजिल के हाल में ठहरने की व्यवस्था है तथा यह कुछ इस तरह से बना हुआ है कि आप हाल में जमीन में सो कर भी दिन-रात नर्मदा के दर्शन कर सकते हैं।सार्वजनिक जीवन से जुड़े हुए हम में से ऐसा कौन होगा जो डॉक्टर विजय लक्ष्मी साधो से परिचित ना हो? डॉक्टर विजय लक्ष्मी साधो स्वयं मध्य प्रदेश सरकार में अनेक बार मंत्री रह चुकी हैं तथा वर्तमान में अभी भी मंडलेश्वर से विधायक हैं। उनके पिता सीताराम साधो भी मध्य प्रदेश की राजनीति में अग्रणी रहे हैं। मेरे साथी परिक्रमा वासी राम निवास तिवारी उनके पूर्व परिचित रहे हैं। हम मंडलेश्वर जाकर ही जान पाए कि राजनीतिक जीवन में सक्रिय डॉक्टर विजय लक्ष्मी साधो इस प्रकार नर्मदा परिक्रमा वासियों की सेवा से जुड़ी हुई है।

मंडलेश्वर के नर्मदा घाट में हमने संध्या स्नान किया। वहां नर्मदा घाट का निर्माण कुछ इस तरह से किया गया है कि दूर तक पानी घुटने तक ही है इसलिए अंधेरे में भी हमें स्नान करने में कोई असुविधा नहीं हुई। अन्य बहुत से श्रद्धालु वहां संध्या स्नान कर रहे थे। नर्मदा तट में स्नान एवं नर्मदा की पूजन आरती कर दीपदान किया। दीपदान करने के बाद दूर तक दीपों को देखते रहने का जो सुख है उसका बखान करना मुश्किल है। हम नर्मदा तट पर ही काफी देर तक बैठे रहे। तट पर ही बने भैरव नाथ के मंदिर में संध्या आरती हो रही थी उसका भी हमने बैठे-बैठे दर्शन लाभ लिया नर्मदा तट बसे मंडलेश्वर के धर्म प्रिय नर नारी बाल बच्चों सहित नर्मदा आरती में भाग लेने आए थे। एक ही नारा नर्मदे हर,, तीज हो त्यौहार हो, पूजा हो उपवास हो, सुख हो दुख हो, सब नर्मदा मैया के तट पर आते हैं। आरती में भी नर्मदा तट आना शायद उनका यह नित्य कर्म है। बड़े भाग्यशाली हैं ये लोग। मैं विचार मगन था कि तभी एक संभ्रांत व्यक्ति ने आकर विचार भंग किया। आप परिक्रमा वासी हैं? हमने कहा जी। फिर आप यहां क्यों बैठे हैं चलिए ऊपर आप लोगों के रुकने खाने की व्यवस्था है। मैंने कहा धन्यवाद। हम दीदी डॉक्टर विजय लक्ष्मी साधो के नर्मदा आश्रय स्थल में आज रुके हुए हैं। अच्छा,, अच्छा,,। नर्मदे हर कहकर वे नर्मदा में दीप दान करने लगे।

मुझे अच्छा लगा कि यहां के लोग नर्मदा परिक्रमा वासियों की सेवा के लिए इस तरह तत्पर रहते हैं।

रात्रि के लगभग 8:30 बज चुके थे। हम नर्मदा तट से उठकर दीदी के आश्रय स्थल आ गए। वहां जोशी दंपत्ति और तिवारी के साथ दो और लोग बैठे थे। हमारे पहुंचते ही नर्मदे हर कह कर खड़े हो गए। जोशी भैया ने हमारा परिचय एक सज्जन से कराया ,,इनका नाम रतनदीप मोयदे है। इस आश्रय स्थल के कर्ता-धर्ता। उनके साथ जो लड़का था उसका नाम प्रवेश पंचोली है वह आश्रय स्थल के कर्मचारी के रूप में रखा गया है। काफी देर चर्चा के बाद रतनदीप ने हमें भोजन के लिए आग्रह किया। हम भोजन कक्ष में चले गए। वहां रतनदीप ने हमें अपने हाथों से परोसकर भोजन कराया। भैया प्रवेश पंचोली गरम गरम रोटियां बना रहे थे और रतनदीप भैया परस रहे थे। इस बीच उनके फोन लगातार आते रहे। मुझे अंदाजा लगाते देर नहीं लगी की रतनदीप मोयदे सार्वजनिक जीवन में रहते हुए दीदी के आश्रम के माध्यम से इस तरह नर्मदा परिक्रमा वासियों की सेवा से जुड़े हुए हैं। भोजन उपरांत हम सभी फिर से आश्रय स्थल के दालान में बैठ गए। तिवारी मोयदे से चर्चा में मशगूल हो गए।

होली के एक दिन पूर्व चतुर्दशी की रात्रि थी। आसमान में चंद्रमा अपने पूर्ण आकार में था। उससे छिटकी चांदनी चारों ओर फैली थी तथा चंद्रमा का प्रतिबिंब मां नर्मदा के जल में अठखेलियां ले रहा था। ‘ऐसे ही दृश्य को देखकर मैथिलीशरण गुप्त ने चारु चंद्र की चंचल किरणें खेल रही थी जल थल में”की रचना की होगी।खुले आसमान में नर्मदा तट पर इस तरह के आनंद की अनुभूति का वर्णन करना कठिन है।

इधर रतनदीप मोयदे से बात करते-करते तिवारी ने कहा कि जब वह जगदलपुर वाले मुन्ना भैया के साथ भोपाल रहा करते थे तब उनकी बस स्टॉप पर एक मोयदे मिला करते थे। वे उनके परिचित है। रतनदीप ने जवाब दिया वे मेरे पिताजी हैं। अरे वाह,। तिवारी ने कहा। रात्रि काफी हो चुकी थी। अब आप सभी विश्राम करें दिन भर के थके हैं। नर्मदे हर कहकर रतनदीप मोयदे अपने घर चले गए। हम सभी आश्रय स्थल के ऊपरी मंजिल पर विश्राम करने चले गए। वहां से बिस्तर में लेटे लेटे भी हमें छिटकती चांदनी के साथ मां नर्मदा का दर्शन हो रहा था। कब आंख लगी पता ही नहीं चला?

सुबह जब नींद से जागे तब समक्ष मां नर्मदा का अविरल प्रवाह दिखाई दे रहा था। मैं उठ कर खड़ा हो गया और माता को प्रणाम किया। कह सकता हूं की रात्रि में जितना सुंदर नजारा हमने नर्मदा तट का देखा सुबह वह नजारा और सुंदर दिखाई दे रहा है। मां तेरा हर रूप न्यारा है।

आश्रम से दैनिक क्रिया से निवृत हो फिर से नर्मदा स्नान को जाने की तैयारी करने लगे। तब तक परिक्रमावासी रीता जोशी दीदी चाय बना कर ले आई। मैंने दो बार चाय पी और नर्मदा स्नान के लिए निकल गए।

नर्मदा तट पर जाकर देखा तो नर्मदा का पानी बढ़ा हुआ था। मतलब जहां कल शाम हमने नहाया था उसके काफी ऊपर पानी चल रहा था। हम इस बारे में चर्चा ही कर रहे थे कि वहां तट पर खड़े एक जानकार ने बताया कि ऊपर बांध का पानी खोला गया है इसलिए पानी ऊपर सीढ़ियों तक आ गया है।

हम नर्मदा में लगभग 1 घंटे तक स्नान करते रहे। कल महेश्वर में मैकला दोपहर स्नान से वंचित रही थी उसकी कसर उसने यहां मंडलेश्वर में पूरी कर ली।

नर्मदा में भर के स्नान के बाद घाट में स्थित भैरव नाथ के मंदिर में हमने पूजन अर्चन किया। वहां स्थित शिवलिंग का अभिषेक किया तथा काफी देर तक मंदिर मैं बैठकर नर्मदा के जल का दर्शन करते रहे। इस सुख से बढ़कर कोई दूसरा सुख नहीं है।

तभी तट पर किसी ने आवाज लगाई तिवारी हैं क्या? तिवारी ने पलटकर देखा भोपाल से उनके पूर्व परिचित मोयदे समक्ष खड़े हैं। दोनों ने आत्मिक मुलाकात की और हम उनकी इस आत्मीयता का दर्शन करते रहे। कुछ देर बाद हम सभी नर्मदा तट से मां नर्मदा आश्रय स्थल आ गए। वहां निरुपमा ने रीता दीदी को कहा, दीदी अभी मैं भोजन बनाकर खिलाऊंगी। आप हमारे इलाके का विष्णु भोग चावल खा कर देखिए? ठीक है उन्होंने कहा। आश्रम के भैया प्रवेश ने कहा कि मैं आप लोगों को कढ़ी बनाकर खिलाऊंगा। रतनदीप के पिताजी घर से मट्ठा लेकर आए।इस तरह तीनों ने मिलकर चावल कढ़ी रोटी एवं आलू भटे की सब्जी तैयार की। हम सब लोगों ने बैठकर भोजन प्रसादी ग्रहण किया। प्रवेश अत्यंत सेवाभावी एवं विनम्र स्वभाव का नवयुवक है जो आश्रम में भैया रतनदीप के साथ सेवारत हैं।जोशी दंपत्ति पेंड्रा इलाके के विष्णु भोग की खूब तारीफ करते नहीं थक रहे थे। वहां नर्मदा आश्रय स्थल से रवाना होने के पूर्व हमने जोशी दंपत्ति का फोन नंबर भी लिया और उन्हें अपना नंबर देते हुए कहा कि जब आप अमरकंटक पहुंचेंगे तो हमें अवश्य फोन करिएगा। आप दोनों की सेवा करके हमें बड़ी प्रसन्नता होगी। आते समय निरुपमा ने रीता दीदी को कुछ चावल भी दिया । हमारे वहां से निकलते समय प्रवेश अत्यंत भावुक हो गया था कहने लगा आज और रुक जाइए पर हमें तो अब आगे बढ़ना था। रवि से कहा कि अगली बार जब आएंगे तो जरूर यही आएंगे। जोशी दंपत्ति का चरण स्पर्श कर उनसे मैंने आशीर्वाद लिया और 28 मार्च 2021 रविवार को 11:30 बजे लगभग हम आगे परिक्रमा के लिए निकल पड़े।

 

 क्रमशः

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