मध्य प्रदेश

छिंदवाड़ा का गोटमार मेला, पत्थरबाजी में 250 से ज्यादा लोग घायल, अभी तक 16 लोग गंवा चुके जान …

भोपाल/छिंदवाड़ा। मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले का पांढुर्णा वैसे तो संतरे और कपास के लिए पहचाना जाता है, लेकिन अब गोटमार भी इसकी मुख्य पहचान बन चुकी है. मेले को देखने दूर-दूर से लोग आते हैं. शनिवार को यहां आयोजित हुए परंपरागत और विश्वप्रसिद्ध ‘गोटमार’ मेले में पत्थरों के हमले से 250 से अधिक युवक घायल हो गए. इनमें से एक दर्जन से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हैं. सभी गंभीर घायलों को नागपुर रैफर किया गया है. हालांकि, कुछ घायलों का इलाज पास ही में प्रशासन की ओर से बनाए मेडिकल कैंप में किया गया.

दो गांवों के बीच होने वाला पत्थरबाजी का यह परंपरागत मेला सुबह 11 बजे शुरू हुआ. दोपहर होते-होते इस पत्थरबाजी में 250 से ज्यादा लोग घायल हो गए. करीब ढाई सौ साल पुराने इस खेल में सांवरगांव और पांढुर्णा के लोगों ने एक-दूसरे पर जमकर पत्थरबाजी की. मेले के इतिहास में अभी तक 16 लोगों की जान भी जा चुकी है. इसके बाद भी परंपरा के नाम पर चल रह यह खेल आज भी जारी है.

इस मेले की तैयारियां आयोजन से कुछ दिन पहले ही कर ली गई थीं. जिस जगह यह खेल आयोजित किया गया, वह छिंदवाड़ा जिला मुख्यालय से करीब 70 किमी दूर कन्हान नदी पर बने पुल पर पांढुर्णा और सांवरगांव के लोग खेलते हैं, इस खतरनाक खेल में दोनों ओर से पत्थरबाजी की जाती है.

पत्थर किसको और कितना घायल करेगा, इससे पत्थरबाजों को कोई मतलब नहीं होता. इसके लिए एक दिन पहले पुल के पास दोनों ओर पत्थर इकट्ठे किए जाते हैं, ताकि पत्थरबाजी में किसी तरह की कमी न रह जाए. इस बार भी ऐसी ही व्यवस्था पहले ही कर ली गई थी. उसके बाद सुबह होते ही खिलाड़ियों का आना शुरू हो गया और थोड़ी देर बाद दोनों ओर से पत्थरबाजी शुरू हो गई.

सफल नहीं हुए खूनी खेल को रोकने के प्रयास

आज भी गोटमार का खेल नजदीक आते ही मृतकों के परिवार वाले सिहर उठते हैं। वहीं, गोटमार खेलने वालों के परिवारों की जान सांसत में बनी रहती है। इस खूनी खेल को रोकने के लिए यहां पदस्थ रहे कलेक्टरों ने कई बार प्रयास भी किए। वर्ष 1998 में तत्कालीन कलेक्टर मलय श्रीवास्तव ने गोटमार स्थल पर रबर की गेंदें डाली थीं, लेकिन लोग गेंद अपने घर ले गए और पत्थरों से ही गोटमार खेला। वर्ष 2008 में कलेक्टर निकुंज श्रीवास्तव ने स्वरूप बदलने के लिए खेल स्थल पर सांस्कृतिक आयोजन कराया, लेकिन भीड़ ने आक्रोशित होकर पुलिस और प्रशासन पर ही पथराव कर दिया था। गोटमार स्थल से अधिकारियों को भागना पड़ा था।

प्रेम से हुई खूनी खेल की शुरुआत

बता दें, इस खेल को एक किवदंती से जोड़ा जाता रहा है. यहां के लोगों का कहना है कि पांढुर्णा के लड़के को सांवरगांव की लड़की से प्रेम हो गया था. उनकी इस प्रेमकहानी पर दोनों गांवों के लोगों को एतराज था। एक दिन सभी के विरोध को झेलते हुए लड़का-लड़की भाग गए. भागते हुए अभी दोनों ने आधी नदी तक का ही सफर किया था कि दोनों ओर के ग्रामीणों को इसकी सूचना मिल गई और प्रेमी जोड़े पर दोनों तरफ से पत्थरों की बरसात होने लगी। इस पथराव में दोनों की मौत नदी के मझधार में हो गई। बताया जाता है उसी समय से इस खेल की शुरुआत हुई और यह यहां की परंपरा बन गई।

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