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झाड़ फूंक और टोने टोटके से नहीं हटेगा कोरो ना …

सोच को वैज्ञानिक बनाएं, अंधविश्वासी और अप्रमाणित इलाज के चक्कर में न पड़ें।  मौजूदा भयावह कोरो ना महामारी की हर लहर जानलेवा साबित हो रही है। इसी के साथ यह भी जग जाहिर सच है कि इस महामारी से वही लोग बच पा रहे हैं, जिन्होंने चिकित्सा की आधुनिक पद्धतियों और उपायों को व्यवहार में लाया। दूसरी ओर इस महामारी से वे लोग नहीं बच पा रहे हैं, जो इसे दैवी आपदा मान रहे हैं और अंधविश्वास के चक्कर में अप्रमाणित दवा के नाम पर गौ मूत्र और गोबर का इस्तेमाल कर रहे हैं। टोना टोटका कर रहे हैं या ओझा गुनी व तांत्रिक से झाड़ फूंक करवा रहे हैं।

अपने देश में बीमारियों और महामारियों को लेकर आम जनता की समझ को वैज्ञानिक बनाने की दिशा में कोई खास प्रयास नहीं किया गया है। स्वाइन फ्लू के समय स्वामी विवेकानंद और उनकी शिष्या भगिनी निवेदिता ने महामारी से बचने के लिए सलाह भी जारी किए थे। लेकिन इसके बाद के दिनों में स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता के लिए कोई उल्लेखनीय कदम नहीं उठाए गए। जो कदम उठाए गए उससे बहुत बड़ी आबादी लाभान्वित नहीं हो सकी। नतीजा यह है कि वे आज भी अनेक बाबाओं,तांत्रिकों और ओझा गुनी के चक्कर में फस कर तबाह हो रहे हैं।

देखा गया है कि पढ़े लिखे लोग भी अंध विश्वास के वशीभूत अनाप शनाप हरकतें करते हैं। दूसरे देशों के लोगों को यह बात समझ में आ गई है कि कोरो ना महामारी की एकमात्र वजह कीटाणु है, लेकिन अपने देश में आज भी बहुत से लोग हैं, जो कोरो ना को दैवी आपदा मान रहे हैं। इसलिए अपने देश में कोरो ना के खिलाफ जन जागृति अभियानों के जरिए यह बात पूरी शिद्दत से समझाने की जरूरत है कि हम अगर वैज्ञानिक समझ से सोचते करते होते तो आज कोरो ना से जितना नुकसान हुआ है, वह नहीं हुआ होता। इतना कोहराम और हाहाकार भी नहीं होता। इतने लोगों की मुफ्त में मौत नहीं हुई होती। उन्हें श्मशानों और कब्रगाहों में अपने प्रिय जनों के अंतिम संस्कार के लिए लंबी लंबी कतारों में खड़ा नहीं होना पड़ता और ना ही वे लाशों को नदियों में बहाने के लिए विवश होते। इसी के चलते आज कारोबार की हालत बिगड़ी और घर परिवार तबाह हुए । प्रियजन बेसहारा और

बच्चे अनाथ हो गए। भारी संख्या में लोग बेरोजगार हो गए। अभी भी निश्चित नहीं है कि कोरो ना मानवता को कब मुक्ति मिलेगी। कोरो ना की तीसरी लहर के भी आने की संभावना बताई जा रही है। हमें आगामी खतरों के लिए सावधान होने के साथ अंधविश्वास और टोने टोटके से भी खुद को मुक्त रखना होगा।

कोरो ना के फैलाव की शुरुआत पिछले साल जनवरी में ही हो गई थी। समय पर वैज्ञानिकों ने कोरो ना की आशंका जाहिर कर चेता दिया था। पर हमने ध्यान नहीं दिया। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी कोरो ना को वैश्विक महामारी घोषित करने में देर कर दी। संगठन ने 11 मार्च को वैश्विक महामारी घोषित की। हमने वैज्ञानिकों की चेतावनी को हल्के में लिया और खास कर अपने देश में इसे दैवी आपदा मान कर दूसरे गैर जरूरी उपाय करते रहे। मास्क लगाने, दूरी बनाए रखने और हाथ धोने जैसे वैज्ञानिक और प्रमाणित उपायों को नकारते रहे। आजादी के पहले भी विभिन्न महामारियों में करोड़ों लोगों की मौत हुई क्योंकि अंग्रेजों को भारतीय जनता के स्वास्थ्य से कोई लेना देना नहीं था और ज्यादातर निरक्षर और अंधविश्वासी जनता इसे दैवी आपदा मान कर बचाव के लिए अप्रमाणित उपाय करती रही। झाड़ फूंक, टोना टोटका और पूजा पाठ में लगी रही।

मौजूदा कोरो ना काल में भी लोग कोरो ना से मुक्ति के लिए अंधविश्वासी कदम उठाने से बाज़ नहीं अा रहे हैं। पिछले साल तो हमने लॉक डाउन के दौरान कोरो ना को भगाने के नाम पर थालियां व तालियां बजाईं। शंख फूकें और टॉर्च और दीप जला कर रौशनी भी की। बावजूद दूसरी लहर इतनी कारुणिक हो गई। लोगों के मरने का सिलसिला तेज़ हो गया। समय रहते हमने वैज्ञानिक दृष्टि से आगामी खतरों को भांप कर पूर्व तैयारी के बारे में नहीं सोचा। अस्पतालों,दवाइयां और ऑक्सीजन सिलेंडर की पर्याप्त व्यवस्था नहीं कर सके।

आज जब कोरो ना व्यापक हो रहा है तो हमारे नेता हमें नीम की पत्तियां जलाने, नाक में तिल या नारियल तेल या घी डालने के साथ गौ मूत्र पीने,गोबर लेपने और नाक में नींबू का रस डालने जैसी अप्रमाणित सलाह सरेआम दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर ऐसा प्रचार जम कर किया जा रहा है कोरो ना का वायरस हवा में नहीं फैले इसके लिए घर घर में हवन करें।

विशेषज्ञों ने कई बार कहा है कोरो ना संक्रमण को रोकने गोबर और गौ मूत्र नाकाम है। फ़िर भी अहमदाबाद में एक प्रसिद्ध गौ शाला में गोबर के इस्तेमाल के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक यहां कई लोगों के शरीर पर गोबर लेपने के बाद उन्हें दूध से नहलाया भी गया। मध्य प्रदेश के गुना जिले के बमोरी ब्लॉक में एक सूखी नदी की खुदाई की गई तो उनमें पानी निकला। फ़िर लोगों ने अफवाह उड़ा दी कि नदी से निकला पानी चमत्कारी है, इसे जो भी पिएगा उसे कोरो ना नहीं होगा। अफवाह फैलते ही देखते ही देखते वहां लोगों की अच्छी खासी भीड़ जमा हो गई और वे नदी का गंदा पानी भी दवा मान कर पीने लगे। अधिकारियों का समझाने का भी उन पर कोई असर नहीं पड़ा। मध्य प्रदेश के ही शिवपुरी जिले के एक गांव में कर्फ्यू के बावजूद ग्रामीणों ने कोरो ना को भगाने के लिए विशेष पूजा और भंडारे का आयोजन किया। जब पुलिस रुकवाने पहुंचीं तो ग्रामीणों ने उन पर पथराव किया। उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में यह अंध विश्वास व्याप्त है कि देवी के नाराज़ होने से ही कोरो ना फैला है। बड़ी संख्या में महिलाएं देवी की पूजा कर कोरो ना के प्रकोप से मुक्ति के लिए मन्नतें मांग रही हैं। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में कोरो ना को दैवी आपदा मान कर शहरी और ग्रामीण महिलाएं कोरो ना माई को रोजाना सुबह शाम जल चढ़ा रही हैं। राजस्थान के झालावाड़ जिले के डग इलाके में लोग दिन के समय गांव के पुरुष पूरा गांव खाली कर जंगलों में चले जाते हैं और शाम होने पर ही वापस लौटते हैं। ऐसा वे  देवी माता के निर्देश पर कर रहे हैं। अहमदाबाद में सानंद जिले के नवापुर गांव में कोरो ना को भगाने के नाम पर सैकड़ों महिलाओं को सिर पर पानी भरे कलश लेकर मंदिर की परिक्रमा करवाई गई फिर उन कलशों का पानी गांव के पुरुषों ने उड़ेला। यह तो थोड़ी सी बानगी है जो मीडिया में आई है। ऐसे अंध विश्वाश और टोने टोटके वाले अनेक उपाय आज भी धड़ल्ले से अपनाए जा रहे हैं।

 

©हेमलता म्हस्के, पुणे, महाराष्ट्र                                  

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