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आधुनिक ….

 (लघुकथा)

 

वह सदा आधुनिकता की अंधी दौड़ में दौड़ती रही। आधुनिक दिखने के लिए ऐसे -ऐसे कपड़े पहनती। आधुनिक नहीं, अजीब लगती। सज -धज कर फ़ोटो खिंचवाना, उसका शौंक है। उसकी सोच बस यहीं तक

है।

बेटे की शादी की। एक साल में ही तलाक़। दूसरी बार की। पंद्रह दिन में शादी ख़त्म। तीसरी बार किए दो साल हुए हैं। बहू ने जुड़वा बेटियों को जन्म दिया। मैडम से बर्दाश्त नहीं हो रहा। एक तो बेटा होता !बहू से हर पल तू -तू, मैं-मैं। बेटे पर दबाव बना रही हैं-इसे तलाक़ दे दे।

अब तो बेटा भी परेशान है। और कितनी शादियाँ करूँ?

कल सारा दिन क्लेश के बाद बेटे ने कहा -माँ!खुद को नहीं। सोच को आधुनिक करो।

कल से चिल्ला रही हैं- बहू ने मेरे बेटे पर जादू कर दिया।

 

©डॉ. दलजीत कौर, चंडीगढ़                                                             

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