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कड़वी बात …!

कल एक मित्र ने एक चीनी नागरिक का ट्वीट शेयर किया था। बीजिंग में एक चुटकला चल रहा है कि भारत चंद्रमा और मंगल पर मिशन की तैयारी कर सकता है लेकिन अपने मजदूरों को एक हजार किलोमीटर नहीं भेज सकता ! बात कड़वी है लेकिन सच है। अनियोजित निर्णयों से उपजी समस्या का सामना इस देश ने नोटबंदी के समय भुगता है। अब वैसे ही चार घंटे के अल्टीमेटम से उपजे तांडव को भारत के लगभग सभी राजमार्गों पर घटते देखा जा सकता है। लाख गलतियों के दोषी नेहरू और उनके उत्तराधिकारियों ने देश में शिक्षा और स्वास्थ का ढांचा न खड़ा किया होता तो क्या होता ? नफ़रत के रोलर पर सवार नए भारत का निर्माण करने वालों के खाते में एक मूर्ति और 10-15 शहरों के नाम बदलने के अलावा कुछ भी उल्लेखनीय नहीं है।

सुबह आईने के सामने अपनी दाढ़ी में कंगा चलाते हुए अपनी छवि से आत्ममुग्ध पलों में उन्हें कई बार इस हकीकत का एहसास होता होगा कि उन्होंने सिर्फ वाणी विलास के अलावा कुछ नहीं किया है। आपदा की शुरुआत से लेकर अभी तक के सफर में कई विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों ने अपने अनुभव और ज्ञान से उनकी मदद करना चाहा लेकिन वे तैयार नहीं हुए। दुनिया के देश जब इन क्षणों में अपने नागरिकों को राहत के रूप में नकदी उपलब्ध करा रहे थे तब वे एक ऐसा चमत्कारी पैकेज लेकर आये जिसे शेयर बाजार से लेकर इंडस्ट्री तक ने ‘मेगा लोन मेला’ कहकर दूरी बना ली। राहत पैकेज की असफलता के बाद भारत का मध्यम वर्ग और निम्नवर्ग अब आत्मनिर्भर होने के अलावा कुछ नहीं कर सकता।

उनके समर्थकों को एक बार इंटरनेट पर चीनी समाचार पत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ में छपी भारत विरुद्ध टिप्पणियों को अवश्य देखना चाहिए। जिस हेय दृष्टि से हमारा मीडिया पाकिस्तान को दर्शाता है वैसा ही कुछ चीन में भारत को लेकर वायरल हो रहा है। स्मरण रहे ! लाल आंखे दिखाने के लिए मुहर्त नहीं देखा जाता …!

©संकलन – अनिल तिवारी, महासचिव व्यापारी महासंघ, बिलासपुर, छत्तीसगढ़

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