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नर्मदा परिक्रमा मार्ग में तापी नदी जहां अलग-अलग स्वरूपों में विराजमान हैं महादेव …

नर्मदा परिक्रमा भाग – 13

 

अक्षय नामदेव । नर्मदा परिक्रमा मार्ग में स्थित प्रकाशा महाराष्ट्र के नंदुरबार जिले में है जिसे दक्षिण के काशी के रूप में मान्यता प्राप्त है। प्रकाशा में तापी नदी के किनारे विशाल मंदिर प्रांगण है जिसमें अनेक मंदिरों के आधुनिक एवं प्राचीन निर्माण है। इन्हीं मंदिरों के समूह में मुख्य मंदिर में दो गर्भ ग्रह स्थित है जिसके एक गर्भ गृह में भगवान केदारेश्वर शिवलिंग विराजमान है तो दूसरे में भगवान विश्वेश्वर विराजमान है। दक्षिण काशी के रूप में मान्यता प्राप्त इस स्थान पर महाराष्ट्र के कोने-कोने से तीर्थयात्री दर्शन के लिए आते हैं। इस मार्ग से गुजरने वाले परिक्रमा वासी अनिवार्य रूप से यहां भगवान भोलेनाथ का दर्शन एवं पूजा अर्चना करते हैं। हम सभी परिक्रमा वासियों ने यहां काफी देर तक रुक कर भोलेनाथ का पूजन अभिषेक करने के बाद आगे की परिक्रमा पर चल पड़े। पानसेमल से प्रकाशा हम जुलवानिया, सेंधवा, शहादा तालौंदा होते हुए आए थे। यह सब महाराष्ट्र के नगर हैं।

प्रकाशा पार होते ही हम गुजरात राज्य की सीमा में प्रवेश करने लगे। जैसे-जैसे हम गुजरात में प्रवेश कर रहे थे गर्मी और उमस तेज होती जा रही थी। दरअसल हम समुद्र के निकट पहुंच रहे थे इसलिए स्वाभाविक रूप से हमें जोरदार उमस भरी गर्मी का सामना करना पड़ रहा था। इधर दोपहर ज्यादा होने के कारण हम परिक्रमावासियों को भूख लगने लगी थी और हम चाहते थे कि किसी उचित स्थान पर रुक कर भोजन बनाया जाए। तभी हमारी नजर मार्ग के दाई ओर स्थित जलाराम आश्रम अन्न क्षेत्र पर पड़ी। हम वहीं रुक गए।

जलाराम आश्रम अन्न नर्मदा परिक्रमा मुख्य मार्ग पर गुजरात के नर्मदा जिले के डेडियापाडा नगर के पहले ही स्थित है। डेडियापाडा गांव है या नगर ठीक से कह नहीं सकता मगर यहां के गांव भी तो नगर जैसे ही दिखाई देते हैं। जलाराम आश्रम अन्न क्षेत्र के अंदर जाकर आश्रम में स्थित मंदिर में दर्शन करने पश्चात हमने जानकारी ली कि क्या यहां भोजन बनाने की व्यवस्था हो सकती है? हां हां क्यों नहीं? हम यहां सेवा के लिए ही हैं आश्रम के जिम्मेदार कार्यकर्ता ने जवाब दिया। लगभग डेढ़ एकड़ में फैले आश्रम क्षेत्र को बड़े मनोयोग से स्थापित किया गया है। आश्रम साफ सुथरा एवं सुंदर है। मंदिर के सामने मैदान छोड़कर सार्वजनिक रसोई बनी हुई है। वहां हमें भोजन बनाने की अनुमति मिल गई। हमारे पास सभी प्रकार की खाद्य सामग्रियां थी परंतु दोपहर के समय को देखते हुए हम लोगों ने खिचड़ी बनाना तय किया। हमारे परिक्रमा वासी दल की उत्साही साथी श्रीमती मधु ने आगे होकर स्वयं खिचड़ी बनाने की जिम्मेदारी ली। बिसेन चाची, निरुपमा तथा कल्पना एवं मैकला  आवश्यक सहयोग में जुट गए। लकड़ी जलाई गई। खिचड़ी में मिलाने के लिए सब्जियां काटी गई। इस बीच आश्रम के संचालक श्री 1008 महामंडलेश्वर सुरेंद्र दास महाराज जो कहीं बाहर गए थे उन्हें आश्रम के कार्यकर्ताओं ने सूचना देकर बुलवा लिया। वे हमारे भोजन बनने के पहले आश्रम पहुंच गए। सुरेंद्र दास महाराज सरल सज्जन और बातचीत के धनी जान पड़े। उनके आने पर परिचय इत्यादि की औपचारिकता हुई तथा हम भोजन बनने तक सभा कक्ष में उनके साथ सत्संग करते रहे। बातचीत में माहिर साथी परिक्रमा वासी राम निवास तिवारी एवं कामता महाराज के साथ उनकी चर्चा होती रही। तब तक खिचड़ी तैयार होने की सूचना मिली और हम रसोई के पास बिछी टाट पट्टी में जाकर लाइन से बैठ गए। इतनी शानदार खिचड़ी बनी थी कि उसके स्वाद का वर्णन शब्दों से कर पाना कठिन है। या यू कहूं 56 प्रकार के भोग एक तरफ और यह खिचड़ी है तरफ,,! भोजन में स्वाद होता है या भूख में,,? मैंने तो भर के खिचड़ी खाई। साथी परिक्रमा वासी भी खिचड़ी की तारीफ करते नहीं थक रहे थे।  कामता महाराज दोपहर में भोजन नहीं करते सिर्फ एक टाइम ही रात्रि में भोजन करते हैं इसलिए उनका ध्यान रखते हुए सुरेंद्र दास महाराज ने उन्हें दो बार मनुहार पूर्वक चाय पिलाई। हरिद्वार कुंभ तथा चित्रकूट तीर्थ के बारे में चर्चा होती रही। आश्रम के स्थापना एवं निर्माण के संघर्ष दिन के दिनों की भी चर्चा भी उन्होंने की। महात्मा ने बताया कि पहले यह क्षेत्र जहां आश्रम स्थापित है सुनसान था कोई आबादी नहीं थी, पर अब यह नगर से बिल्कुल लगा हुआ हो गया है। काफी आबादी बस गई है।

साथी महिला परिक्रमा वासियों के भोजन करने तक हम एक बार फिर महाराज के साथ सत्संग में लग गए। इस बीच महाराज से हमारी निकटता जैसी हो गई और उन्होंने हमें कहा कि यदि आप चलना चाहे तो मैं यहां से कुछ दूर नर्मदा तट पर स्थित वेदव्यास करजण संगम तीर्थ रूंढ़ जिला नर्मदा के दर्शन करा सकता हूं। वहां भी हमारा आश्रम है। उन्होंने बताया कि कर्जण संगम बहुत पावन तीर्थ है तथा इस पर हम सभी परिक्रमा वासियों की आपसी सहमति नहीं बन पाई। साथी परिक्रमा वासी घनश्याम सिंह ठाकुर का कहना था कि यदि हम सीधे चले तो आज हम समुद्र तट पर पहुंच सकते हैं।

सबके खिचड़ी प्रसाद ग्रहण करने के बाद कुछ देर विश्राम के बाद हम सभी परिक्रमा वासियों ने महात्मा सुरेंद्र दास से विनम्रता पूर्वक विदा ली और आगे परिक्रमा पर चल पड़े। हर हर नर्मदे

क्रमशः

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