मजदूरों के प्रवास पर राष्ट्रीय नीति बने केन्द्र सब कुछ तय ना करे …

मजदूर दिवस है और मजदूर परेशान है। रोजगार तो बंद है ही पेट की भूख भी उसे मारे जा रही है। इतना ही नहीं अब उसकी वापसी का ऐलान तो हो गया है लेकिन केन्द्र के गृहमंत्रालय में बैठे बाबुओं ने उसे इतना उलझा दिया है कि उसका पूरा पालन किया जाये तो कोई भी शायद ही घर पहुंच पायेगा।

सबसे बड़ा पेंच फंसा दिया कि जो मजदूर जहां फंसा है वहाँ का जिला प्रशासन पहले उसका रजिस्ट्रेशन करे। फिर उसे राज्य और जिला वार बांटे, फिर राज्य और संबंधित जिला अधिकारी परमीशन दे तब निकले। उस पर भी वाहन की परमीशन अलग से दी जाये। बस कहां से किसे मिलेगी इसकी कोई अभी तैयारी नहीं। कुल मिलाकर केन्द्र ने राज्यों के पाले  में गेंद डाल दी है और कहा कि देख लो कैसे करोगे। ये बहुत ही अमानवीय है। मजदूर को अपने पेट भरने और वापसी की चिंता है। वो सड़क पर है लेकिन सरकार चाहती है कि वो आनलाईन फार्म भरे और फिर उसका ऐप भी डाऊनलोड करे। इतना ही नहीं जाने से पहले उसे अपनी जांच कराकर सर्टिफिकेट भी लेना होगा तभी जाने मिलेगा।

एक उदाहरण से बात समझे अकेले मुंबई महानगर रीजन में यूपी बिहार के करीब 25 लाख मजदूर है वो जाना चाहते है। दोनों राज्यों ने एक एक नोडल अफसर और एक एक मोबाईल नंबर दिया है। राज्य के जिला प्रशासन से पहले उनको रजिस्ट्रेशन करना होगा। फिर जांच कराना होगी, एप डाउनलोड करना होगा और फिर जब उसके अपने गृह जिले से परमीशन आ जायेगी तब जाने मिलेगा। क्या ये संभव है कि पहले ही कोरोना के करीब दस हजार मामले झेल रहा मुंबई प्रशासन इन सबका रजिस्टेशन कर पायेगा। उनकी जांच कर पायेगा। उनके राज्यों से बात करके परमीशन दिला पायेगा। वो भी तब जबकि अत्यावशयक सेवाओं को छोडकर सारे सरकारी दप्तर बंद है।

इतना ही बिहार यूपी के अलावा राजस्थान के सात लाख। मध्यप्रदेश के दो लाख, उडीसा के चार लाख और छततीसगढ के करीब एक लाख मजदूर भी महाराष्ट्र में फंसे है। कैसे होगा इनका इंतजाम। साफ है कि सरकारें चाहे वो राज्य की हो या केन्द्र की बस बाबुओं के बताये रास्ते पर चल रही है मजदूरों की उनको नहीं पडी है।

होना तो ये चाहिये कि अभी सबको वापस जाने की खुली छूट होनी चाहिये वो चाहे अपने इंतजाम से जाये या निजी बसों से। उसमें फिजिकल डिस्टेसिंग का पालन हो ये जरूरी है। जब ये मजदूर अपने अपने गृह जिलों में पहुंचे तब उनका रजिस्ट्रेशन हो। जांच हो और वहीं पर उनको अलग भी रखा जाये। ये संभव होगा क्योंकि इसमें मजदूर बंट जायेंगे। अपनी भाषा बोलेंगे और संबंधित जिलों में रहने पर उनको सुरक्षा का अहसास भी होगा।

 उसके साथ ही जिला प्रशासन के पास पूरा आंकडा होगा कि कितने लोग आये और उनको आगे कैसे रोजगार की जरुरत है। तब नयी तैयारी भी हो पायेगा। बिहार के मुख्यमंत्री नितिश कुमार ने सही कहा कि प्रवासी मजदूरों पर राष्ट्रीय नीति बने और फिर राज्यों को उस पर अमल की छूट हो लेकिन केंद्र के बाबू सब कुछ तय करने लगेंगे तो फंसे हुए मजदूरों का उबाल बाहर आ सकता है तब उनको संभालना मुश्किल होगा।

©संदीप सोनवलकर, मुंबई