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इंदौर में ताई-भाई के बाद अब ‘दीदी’ का जलवा

इंदौर। मालवा की राजनीति में, खासकर इंदौर में हमेशा से ही पार्टी का ध्रुवीकरण होता रहा है। चाहे वह कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी। इंदौर में वर्षों तक भारतीय जनता पार्टी की स्थानीय राजनीति भी ‘ताई’ और ‘भाई’ के बीच बंटी रही। ‘ताई’ यानी सुमित्रा महाजन जो देश के लोकसभा की स्पीकर भी रही हैं और कई मंत्री पदों पर सुशोभित रहीं, हमेशा ही भाई यानी  कैलाश विजयवर्गीय से उनका मुकाबला गुटीय तौर पर होता रहा। यहां तक कि कैलाश विजयवर्गीय और सुमित्रा ताई के बीच की तनातनी पार्टी के अंदर ही नहीं, बल्कि पार्टी के बाहर भी दिखाई देती रही। ताई और भाई की इस लड़ाई में कई विधायक मंत्री नहीं बन पाए।

ताई और भाई के इन विवादों के बीच महेंद्र हार्डिया यानी बाबा भी उभरे। बाबा का अपना कोई गुट तो नहीं था, लेकिन बाबा ताई और भाई दोनों से मिलकर चल रहे थे। यही हाल ‘भाभी’ यानी मालिनी गौड़ का रहा। राजनीति में कोई किसी का नहीं होता, लेकिन जब तक जो सत्ता में रहता है, वह कभी दूसरों को अपने बराबर पनपने ही नहीं देता। यही कारण रहा कि भारतीय जनता पार्टी की इंदौर की राजनीति में ‘ताई’ हो या ‘भाई’ हो, इसके अलावा कोई नया नेता नहीं बढ़ सका।

अब शिवराज मंत्रिमंडल की चौथी पारी में  इंदौर से ताई, भाई, बाबा और भाभी सभी को दरकिनार करते हुए संघ की फायर ब्रांड नेता उषा ठाकुर को यानी ‘दीदी’ को शामिल किया गया है। अब इंदौर में ताई -भाई नहीं, बल्कि दीदी का दबदबा रहेगा। देखना यह है कि दीदी ताई और भाई को संतुलित करते हुए इंदौर की कुटिल राजनीति में अपने आप को स्थापित कर शिवराज सिंह के सपनों के शहर को नए मुकाम तक कैसे पहुंचा पाती है।

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